भारत में बाढ़ का इतिहास: अतीत से सीख और वर्तमान में चुनौतियाँ

भारत नदियों का देश है। गंगा, ब्रह्मपुत्र, यमुना और गोदावरी जैसी नदियाँ यहां की जीवनरेखा हैं। लेकिन यही नदियाँ कभी-कभी तबाही का कारण भी बन जाती हैं। भारत में बाढ़ का इतिहास अत्यंत प्राचीन रहा है – चाहे वह प्राचीन सभ्यताओं का पतन हो, मध्यकालीन आपदाएँ हों या आधुनिक दौर की त्रासदियाँ। आज जब जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण बाढ़ की घटनाएँ और बढ़ रही हैं, तब इतिहास से सीखना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी है।

प्राचीन सभ्यताएँ और बाढ़ का प्रभाव

भारत में बाढ़ का इतिहास

सिंधु घाटी सभ्यता (3300-1500 ईसा पूर्व)

  • पुरातत्वविदों का मानना है कि इस सभ्यता के पतन के पीछे लगातार आने वाली बाढ़ और नदियों का मार्ग बदलना एक बड़ा कारण था। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में बाढ़ के प्रमाण मिले हैं।
  • प्राचीन ग्रंथों और लोककथाओं में भी बाढ़ का वर्णन मिलता है, जो दर्शाता है कि यह आपदा इंसानी जीवन पर हमेशा से प्रभाव डालती रही है।

मध्यकालीन भारत और बाढ़

मध्यकाल में भी कई बार बाढ़ ने बड़े पैमाने पर जन-जीवन को प्रभावित किया।

  • गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन में बाढ़ की घटनाएँ आम थीं।
  • कई बार किसानों की फसलें पूरी तरह नष्ट हो जाती थीं और अकाल जैसी स्थिति पैदा हो जाती थी।
  • मुगल और दिल्ली सल्तनत के दौर में भी बाढ़ नियंत्रण पर काम किया गया, लेकिन सीमित साधनों के कारण राहत कम ही मिलती थी।

आधुनिक भारत में बाढ़ का इतिहास

भारत में बाढ़ का इतिहास 

1. बिहार की बाढ़ (1978)

  • गंगा नदी के उफान से लगभग 10,000 गांव प्रभावित हुए।
  • लाखों लोग बेघर हुए और हज़ारों की मौत हुई।
  • यह बाढ़ आज भी बिहार की सबसे भीषण त्रासदियों में गिनी जाती है।

2. महाराष्ट्र की बाढ़ (1961, पुणे और अन्य क्षेत्र)

  • पवना और भीमा नदी में आई बाढ़ से हजारों घर नष्ट हुए।
  • औद्योगिक इलाकों को भी नुकसान पहुँचा।

3. मुंबई की बाढ़ (26 जुलाई 2005)

  • 24 घंटे में 944 मिली-मीटर बारिश – एक रिकॉर्ड।
  • पूरी मुंबई ठप हो गई, सैकड़ों मौतें और करोड़ों का नुकसान।
  • इसे भारत की सबसे बड़ी “urban flood” घटनाओं में गिना जाता है।

4. केरल की बाढ़ (2018)

  • इसे 100 साल की सबसे बड़ी बाढ़ कहा गया।
  • 400 से अधिक लोग मारे गए और लाखों विस्थापित हुए।
  • इस आपदा का संबंध जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक वर्षा से जोड़ा गया।

अतीत और वर्तमान की तुलना

  • पहले – बाढ़ मुख्यतः नदियों के उफान और प्राकृतिक कारणों से आती थी।
  • आज – जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण, वनों की कटाई और असंतुलित विकास ने बाढ़ की तीव्रता और दायरे को कई गुना बढ़ा दिया है।
  • पहले राहत और बचाव केवल स्थानीय साधनों तक सीमित था, आज आधुनिक तकनीक और आपदा प्रबंधन मौजूद है, लेकिन जनसंख्या और शहरी दबाव इसे और जटिल बना देते हैं।

आँकड़े और रिपोर्ट

  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के अनुसार, भारत का लगभग 12% भूभाग बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में आता है।
  • हर साल औसतन 1600 मौतें और अरबों रुपए की संपत्ति बाढ़ की भेंट चढ़ती है।
  • जलवायु वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में extreme rainfall events की संख्या और बढ़ेगी।

आधिकारिक स्रोत {NDMA} https://ndma.gov.in


इतिहास से सीख और आगे का रास्ता

भारत में बाढ़ का इतिहास हमें यह सिखाता है कि बाढ़ को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।

क्या करना ज़रूरी है?

  1. नदियों के प्राकृतिक मार्ग का सम्मान: अतिक्रमण रोकना।
  2. ड्रेनेज सिस्टम सुधारना: खासकर शहरी क्षेत्रों में।
  3. बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली: आधुनिक तकनीक से।
  4. पर्यावरण संरक्षण: वनों की कटाई रोकना और पेड़ लगाना।
  5. जन जागरूकता: लोगों को सुरक्षित रहने और बचाव के तरीके सिखाना।

निष्कर्ष

भारत में बाढ़ का इतिहास हजारों साल पुराना है।
चाहे प्राचीन सभ्यताओं का पतन हो या आधुनिक महानगरों की त्रासदियाँ बाढ़ हमेशा से हमारी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रही है। लेकिन फर्क यह है कि आज हमारे पास विज्ञान, तकनीक और ज्ञान है। अगर हम इतिहास से सबक लें और समय रहते कदम उठाएँ, तो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य दे सकते हैं।


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