भारत प्राकृतिक विविधताओं से सम्पूर्ण देश है।
यहाँ की नदियाँ जीवनदायि हैं, वन हरियाली की धरोहर हैं और जीव-जंतु जैव-विविधता के अद्भुत उदाहरण हैं। लेकिन तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या, प्रदूषण, औद्योगिकरण और अंधाधुंध शहरीकरण के कारण यह धरोहर संकट के दौर से गुजर रही है। आइए, हम समझते हैं कि भारतीय नदियाॅं, वन और लुप्त होती प्रजातियां हमारे जीवन में कितने महत्वपूर्ण है और इन्हें बचाने के लिए क्या-क्या प्रयास किए जा सकते हैं।
भारतीय नदियाँ – जीवन की धारा

भारत की सभ्यता और संस्कृति का आधार इसकी नदियाॅं रही है। प्राचीन समय से ही गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाॅं धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रही है।
- गंगा नदी – इसे ‘माँ गंगा’ कहा जाता है। यह सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं बल्कि करोड़ों लोगों के लिए पीने का पानी और खेतों के सिंचाई का स्रोत भी है। लेकिन आज यह नदी औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज और प्लास्टिक प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित है।
- ब्रह्मपुत्र – यह नदी उत्तर-पूर्व भारत की जीवनरेखा है। इसकी बाढ़ मैदानों को उपजाऊ बनाती है, लेकिन जलवायु परिवर्तन और अंधाधुंध बाँध निर्माण इसके प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ रहे हैं।
- यमुना – दिल्ली से बहने वाली यह नदी प्रदूषण का सबसे बड़ा शिकार है। झाग और जहरीला पानी इसके अस्तित्व पर सवाल खड़े कर रहा है।
- नर्मदा और गोदावरी – मध्य भारत और दक्षिण भारत के लिए जीवन का आधार, लेकिन इनकी धाराएँ भी बाँधों और जल दोहन से कमजोर हो रही हैं।
नदियाँ केवल जलधारा नहीं हैं बल्कि कृषि, मछली पालन, बिजली उत्पादन और सांस्कृतिक परंपराओं का आधार हैं।
इनकी रक्षा करना मानव अस्तित्व के लिए बहुत जरूरी है।
भारतीय वन – हरित धरोहर

भारत का लगभग 24% भूभाग वनों से ढका हुआ है। इनमें
हिमालयी शंकुधारी वन, पश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्व के सदाबहार वन, मध्य भारत के शुष्क पर्णपाती वन और सुंदरबन के मैंग्रोव शामिल हैं।
- जैव विविधता का घर – ये वन हाथी, बाघ, तेंदुआ, भालू, गैंडा, सांप और अनगिनत पक्षियों का घर हैं।
- पर्यावरणीय महत्व – वन जलवायु संतुलन बनाए रखते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।
- आर्थिक उपयोग – लकड़ी, औषधीय पौधे, गोंद, रेज़िन और अनेक संसाधन वनों से मिलते हैं।
- आदिवासी जीवन – भारत के कई आदिवासी समुदाय वनों पर ही निर्भर हैं। उनका खान-पान, संस्कृति और जीवनयापन जंगलों से जुड़ा हुआ है।
संकट: वनों की अंधाधुंध कटाई, अवैध खनन, सड़क व रेलवे परियोजनाएँ और शहरी विस्तार ने वनों के क्षेत्रफल को लगातार घटाया है। परिणामस्वरूप कई जंगली प्रजातियाँ विस्थापित हो रही हैं और जलवायु परिवर्तन की समस्या और गंभीर बन रही है।
लुप्त होती प्रजातियाँ – संकटग्रस्त जैव विविधता

भारत जैव विविधता के मामले में विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से एक है। यहाँ लगभग 100,000 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। लेकिन इनमें से कई प्रजातियाँ आज विलुप्ति के कगार पर हैं।
प्रमुख संकटग्रस्त प्रजातियाँ
- बंगाल टाइगर – भारत का राष्ट्रीय पशु। शिकार और आवास क्षरण के कारण इनकी संख्या घट गई थी। हालांकि “प्रोजेक्ट टाइगर” जैसे सरकारी प्रयासों से इनकी संख्या में सुधार हो रहा है।
- एशियाई हाथी – वनों की कटाई और मानव-हाथी संघर्ष के कारण यह प्रजाति गंभीर खतरे में है।
- गंगा डॉल्फिन – भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव। प्रदूषण, जहाजरानी और बांध निर्माण ने इसके अस्तित्व को चुनौती दी है।
- ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (सोनचिरैया) – राजस्थान और गुजरात में पाई जाने वाली यह पक्षी प्रजाति अब गिनती की संख्या में रह गई है।
- एक-सींग वाला गैंडा – असम का गौरव, लेकिन शिकार और आवास की कमी से यह भी संकटग्रस्त है।
इन प्रजातियों की सुरक्षा के लिए संरक्षित क्षेत्र, राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य बनाए गए हैं। लेकिन स्थानीय समुदायों की भागीदारी और जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है।
संरक्षण के प्रयास और चुनौतियाँ

भारत सरकार और कई गैर-सरकारी संगठन (NGOs) नदियों, वनों और प्रजातियों के संरक्षण के लिए प्रयासरत हैं।
- गंगा एक्शन प्लान और नमामि गंगे प्रोजेक्ट गंगा नदी को स्वच्छ बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
- प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलीफेंट बाघों और हाथियों की संख्या बढ़ाने में सहायक रहे हैं।
- वन महोत्सव और वृक्षारोपण अभियान हरियाली बढ़ाने का संदेश देते हैं।
वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र – जैसे काजीरंगा (गैंडा), रणथंभौर (बाघ), सुंदरबन (बाघ और मगरमच्छ), और गिर वन (एशियाई शेर)।
चुनौतियाँ:
- बढ़ती जनसंख्या का दबाव
- औद्योगिक प्रदूषण
- जलवायु परिवर्तन
- शहरीकरण और अवैध शिकार
हमारी भूमिका
सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। जब तक आम नागरिक इस दिशा में कदम नहीं उठाते, तब तक स्थायी समाधान संभव नहीं है।
- प्लास्टिक का कम उपयोग करें।
- वृक्षारोपण में भाग लें।
- जल की बर्बादी रोकें।
- वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए जागरूकता फैलाएँ।
निष्कर्ष
भारतीय नदियाँ वन और लुप्त होती प्रजातियाँ और जैव विविधता सिर्फ प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था और अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं। अगर इन्हें बचाना है, तो हमें विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। सतत विकास, पर्यावरणीय शिक्षा और जनभागीदारी ही वह रास्ता है जिससे हम आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और हरा-भरा भारत दे सकते हैं।
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