अंतरराष्ट्रीय हिम तेंदुआ दिवस: पहाड़ों के दुर्लभ शिकारी की सुरक्षा का संकल्प

हिम तेंदुआ (Snow Leopard) एशिया के उॅंचे-उॅंचे बर्फीले पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाला एक दुर्लभ जीव है।
हिम तेंदुआ मुख्य रूप से 3000 मीटर से लेकर 5,200 मीटर ऊॅंचाई तक हिमालय और मध्य एशिया के अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है। इस जानवर को अक्सर “पहाड़ों का भूत” कहा जाता है क्योंकि यह बहुत मुश्किल से दिखाई देता है और अपने प्राकृतिक वातावरण में अच्छी तरह छिप जाता है।

अंतरराष्ट्रीय हिम तेंदुआ दिवस: कब और क्यों मनाया जाता है?

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly – UNGA) ने दिसंबर 2024 में एक प्रस्ताव पारित करके 23 अक्टूबर को आधिकारिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय हिम तेंदुआ दिवस घोषित किया। हालाॅंकि, यह दिवस 2013 की बिश्केक घोषणा (Bishkek Declaration) के बाद से ही हर साल 23 अक्टूबर को मनाया जाता रहा है, लेकिन इसे संयुक्त राष्ट्र की कैंलेंडर में आधिकारिक तौर पर शामिल करना 2024 में हुआ। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य है – हिम तेंदुए के संरक्षण के लिए जागरुकता फैलाना, स्थानीय समुदायों का समर्थन करना, और इस प्रजाति के अस्तित्व को सुरक्षित रखना।

हिम तेंदुए की कुछ रोचक बातें

  • हिम तेंदुए का वैज्ञानिक नाम Panthera uncia है।
  • यह नाम “तेन्दुआ” होते हुए भी वास्तव में तेंदुए की तरह नहीं बल्कि बाघ परिवार से अधिक संबंध रखता है।
  • इनके बड़े पाँव ऐसे होते हैं कि जैसे प्राकृतिक स्नोशू हो – बर्फ पर चलने में मदद करती हैं।
  • एक छलाँग में ये लगभग 15 मीटर (50 फुट) तक जा सकते हैं – यह उनकी बहुत ही खास प्रवृत्ति है।
  • ये सामान्य रूप से अकेले रहते हैं और ज्यादातर सुबह-शाम सक्रिय होते हैं।

यह प्रजाति खतरें में क्यों हैं?

हिम तेन्दुआ आज अनेक खतरों का सामना कर रहे हैं:

  • आवास विनाश और विखंडन: पर्वतीय इलाकों में मानव गतिविधि, चारागाह का कम होना, सड़क-खनन आदि कारण इनके रहने के ठिकानों को प्रभावित कर रहे हैं।
  • शिकार एवं अवैध व्यापार: उनकी त्वचा, खाल, और अंगों की मांग के कारण अवैध शिकार एक बड़ा खतरा है।
  • प्रेय पशुओं की कमी: बर्फीले पर्वतीय क्षेत्रों में अन्य जंगली जानवरों की घटती संख्या के कारण हिम तेंदुए को अक्सर घर के पालतू जानवरों को निशाना बनाना पड़ता है, जिससे किसानों-चरवाहों द्वारा प्रतिशोध में शिकार की घटनाएँ होती हैं।
  • जलवायु परिवर्तन: ग्लेशियर पिघलना, हिमालय में तापमान में वृद्धि और बर्फ-धुंध का बदलाव इनकी इकोसिस्टम को प्रभावित कर रहा है।

हम क्या कर सकते हैं?

  • सोशल मीडिया और स्कूल-कॉलेज में इस विषय पर जागरूकता फैलाएँ – “हिम तेन्दुआ” और उसकी भूमिका पर चर्चा करें।
  • उन संगठनों का समर्थन करें जो हिम तेंदुए संरक्षण पर कार्य कर रहे हैं – दान, स्वयंसेवा या जानकारी साझा करके।
  • अगर आप पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं या यात्रा करते हैं, तो स्थानीय नियमों का पालन करें, जंगलों में अवैध गतिविधियों से दूर रहें।
  • स्थानीय समुदायों के लिए टिकाऊ आय स्रोतों (जैसे-प्राकृतिक पर्यटन, पारिस्थितिक खेती) को समर्थन दें – इससे वन्यजीव-मानव संघर्ष कम हो सकता है।
  • अपने आसपास के बच्चों में जानवरों-प्राकृतिक जीवन के प्रति संवेदनशीलता जगाएँ।

निष्कर्ष

हिम तेन्दुआ सिर्फ एक खूबसूरत बाघ-प्रजाति नहीं है, बल्कि यह एक संकेतक (indicator) है – उस स्वास्थ्यवान पर्वतीय इकोसिस्टम का, जहाँ वन्यजीव, मानव और प्रकृति संतुलित तरीके से सह-अस्तित्व में रहते हैं। लेकिन अगर यह संतुलन
खो गया, तो फलस्वरूप हमें जलवायु, जल स्रोत, चरागाह, इकोलॉजी से जुड़ी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

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