भारत की भौगोलिक संरचना में हिमालय की ऊचाइयाॅं यदि देश का मुकुट हैं, तो अरावली पर्वतमाला उसकी रीढ़ की हड्डी है। दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक, अरावली केवल पत्थरों का ढेर नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत की जलवायु, अर्थव्यवस्था और अस्तित्व का आधार है। लगभग 692 किलोमीटर लंबी यह श्रृंखला गुजरात के पालनपुर से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा को पार करते हुए दिल्ली के रायसीना हिल्स तक फैली हुई है। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि अरावली पर्वतश्रंखला का महत्व भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है।
1. अरावली का ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व
अरावली का इतिहास पृथ्वी के जन्म के कुछ समय बाद का है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार, अरावली का निर्माण ‘प्रोटरोजोइक युग’ (Proterozoic Era) में हुआ था, जो इसे हिमालय से भी करोड़ों साल पुराना बनाता है।
- प्राचीनता: माना जाता है कि अरावली कभी हिमालय से भी ऊंची हुआ करती थी, लेकिन लाखों वर्षों के अपरदन (Erosion) ने इसकी ऊंचाई कम कर दी।
- सभ्यता का पालना: अरावली की तलहटी में ही प्राचीन ‘अहाड़ सभ्यता’ और ‘गणेश्वर सभ्यता’ जैसी संस्कृतियां फली-फूलीं। यह श्रृंखला सदियों से आक्रमणकारियों के लिए एक प्राकृतिक बाधा रही है, जिसने राजस्थान के किलों और इतिहास को सुरक्षित रखा।
2. थार के रेगिस्तान के खिलाफ एक ढाल
अरावली की सबसे बड़ी भूमिका ‘मरुस्थलीकरण’ को रोकना है।
- रेत को रोकना: पश्चिम में थार का विशाल रेगिस्तान है। तेज हवाएं इस रेत को पूर्व की ओर धकेलती हैं। अरावली एक प्राकृतिक दीवार की तरह खड़ी होकर इस रेत को उपजाऊ गंगा के मैदानों (दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी यूपी) में आने से रोकती है।
- मिट्टी की उर्वरता: अगर अरावली न होती, तो आज गुरुग्राम, दिल्ली और आगरा जैसे शहर भी रेतीले टीलों में बदल चुके होते। यह श्रृंखला उत्तर भारत की कृषि योग्य भूमि को बचाए रखने का मुख्य कारण है।
3. जलवायु और मानसून का नियाम-चक्र
अरावली का प्रभाव भारत के मानसून चक्र पर भी पड़ता है
- वर्षा का वितरण: हालांकि अरावली मानसून की अरब सागर शाखा के समानांतर स्थित है (जिसके कारण राजस्थान के पश्चिमी हिस्से में कम बारिश होती है), लेकिन यह मानसूनी हवाओं को उत्तर-पूर्व की ओर निर्देशित करने में मदद करती है।
- तापमान का संतुलन: घने जंगलों वाली अरावली की पहाड़ियाँ दिल्ली-NCR और राजस्थान के तापमान को नियंत्रित करती हैं। यह हीट-वेब के प्रभावों को कम करने का काम करती हैं।
4. उत्तर भारत का वाटर टैंक
अरावली को उत्तर भारत का “वाटर टावर” कहा जा सकता है।
- नदियों का स्रोत: बनास, लूनी, साहिबी, कृष्णावती और दोहन जैसी नदियाँ यहीं से निकलती हैं। साबरमती नदी, जो गुजरात की जीवन रेखा है, उसका स्रोत भी अरावली ही है।
- ग्राउंडवाटर रिचार्ज: अरावली की पहाड़ियों में मौजूद दरारें और ‘फ्रैक्चर’ बारिश के पानी को जमीन के भीतर गहराई तक सोख लेते हैं। यह दिल्ली, फरीदाबाद और गुरुग्राम जैसे शहरों के गिरते जल स्तर को सहारा देने वाला सबसे बड़ा स्रोत है।
5. जैव विविधता का खजाना
अरावली केवल पहाड़ नहीं हैं, बल्कि यह वन्यजीवों का एक समृद्ध गलियारा है।
- वन्यजीव: यहाँ पर तेंदुए, नीलगाय, सांभर, लकड़बग्घा और सियार जैसे जानवर पाए जाते हैं।
- अभयारण्य: सरिस्का टाइगर रिजर्व, कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य, और सीतामाता अभयारण्य इसी श्रृंखला का हिस्सा हैं। यह पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियों के लिए प्रजनन स्थल और प्रवास मार्ग भी है।
6. दिल्ली-NCR के ‘फेफड़े’
दुनिया के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में बदनाम दिल्ली और उसके आसपास के शहरों के लिए अरावली एकमात्र सहारा है।
- ऑक्सीजन का स्रोत: यहाँ के घने वन कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं, जो भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं।
- वायु शोधन: यह धूल के कणों (Dust particles) और धुएं को सोखकर हवा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मदद करते है।
7. आर्थिक योगदान और खनिज संपदा
भारत की अर्थव्यवस्था में अरावली का योगदान अद्वितीय है:
- खनिज संसाधन: यहाँ तांबा, जस्ता (Zinc), सीसा और अभ्रक (Mica) के विशाल भंडार हैं। खेतड़ी की तांबे की खदानें विश्व प्रसिद्ध हैं।
- पत्थर उद्योग: मकराना का संगमरमर और अरावली का ग्रेनाइट निर्माण उद्योगों के लिए बहुत महत्व रखते हैं।
- पर्यटन और रोजगार: माउंट आबू, उदयपुर, और अरावली की ट्रैकिंग साइट्स हजारों लोगों को रोजगार प्रदान करती हैं।
अरावली के अस्तित्व पर मंडराता खतरा

इतनी महत्वपूर्ण होने के बावजूद, अरावली आज गंभीर संकट में है।
मुख्य कारण:
- अवैध खनन: पत्थरों और खनिजों के लिए पहाड़ों को काटा जा रहा है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने कई बार चेतावनी दी है कि अरावली की कई पहाड़ियाँ पूरी तरह गायब हो चुकी हैं।
- अनियंत्रित शहरीकरण: दिल्ली-गुरुग्राम सीमा पर जंगलों को काटकर कंक्रीट के रोड बनाए जा रहे हैं।
- वनो की कटाई: चराई और ईंधन के लिए पेड़ों की कटाई से पहाड़ कमजोर हो रहे हैं, जिससे मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है।
भविष्य की राह: अरावली का संरक्षण
भारत सरकार ने अब अरावली को बचाने के लिए “Aravalli Green Wall Project” की शुरुआत की है। इसके तहत अरावली के चारों ओर 5 किलोमीटर चौड़ी एक हरित पट्टी (Green Belt) विकसित की जाएगी। हमें यह समझने की जरूरत है कि अरावली के बिना उत्तर भारत का इकोलॉजिकल संतुलन बिगड़ जाएगा। जल संकट गहराएंगे और मरुस्थलीकरण हमारी उपजाऊ भूमि को निगल जाएंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
| प्रश्न Question | उत्तर Answer |
| 1. अरावली पर्वतश्रंखला की कुल लंबाई कितनी है? | अरावली की कुल लंबाई लगभग 692 किलोमीटर है, जो गुजरात से शुरू होकर दिल्ली तक फैली हुई है। |
| 2. अरावली को दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला क्यों कहा जाता है? | क्योंकि इसका निर्माण प्रोटरोजोइक युग (लगभग 1.8 बिलियन वर्ष पूर्व) में हुआ था, जो इसे हिमालय से भी प्राचीन बनाता है। |
| 3. अरावली की सबसे ऊँची चोटी कौन सी है? | अरावली की सबसे ऊँची चोटी ‘गुरु शिखर’ है, जो राजस्थान के माउंट आबू में स्थित है और इसकी ऊँचाई 1,722 मीटर है। |
| 4. अरावली दिल्ली-NCR के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? | यह दिल्ली के लिए ‘ग्रीन लंग्स’ का काम करती है, वायु प्रदूषण सोखती है और थार रेगिस्तान की रेत को यहाँ आने से रोकती है। |
| 5. अरावली से निकलने वाली प्रमुख नदियाँ कौन सी हैं? | यहाँ से बनास, लूनी, साहिबी और साबरमती जैसी महत्वपूर्ण नदियाँ निकलती हैं। |
निष्कर्ष
अरावली केवल पत्थरों और चट्टानों की एक श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत का एक सुरक्षा कवच है। सदियों से इसने रेगिस्तान को बढ़ने से रोका है, हमारी प्यास बुझाने वाली नदियों को जन्म दिया है और हमारी हवा को साफ रखा है। आज जब हम जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तो अरावली पर्वतश्रंखला का महत्व और भी बढ़ जाता है।
इसे भी पढ़ें: अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस 2025: पर्वत, ग्लेशियर और मानव जीवन का अटूट सम्बन्ध
