जब भी हम प्रकृति की सुंदरता की बात करते हैं, तो अक्सर हमारे मन में रंग-बिरंगे पक्षियों, बाघों या हरे-भरे जंगलों का मनोहर दृश्य सामने आता है। लेकिन गिद्ध (Vultures) शायद ही किसी के पसंदीता पक्षियों के सूची में आते हों। अपने बड़े पंख, झुकी हुई गर्दन और मरे हुए जानवरों के मांस खाने के कारण उन्हें अक्सर अशुभ या डरावना माना जाता है। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे पर्यावरण के लिए गिद्ध क्यों महत्वपूर्ण है? अगर धरती से गिद्ध पूरी तरह विलुप्त हो जाए, तो इंसानी सभ्यता को बीमारियों और गंदगी जैसे गंभीर समस्यों का सामना करना पड़ेगा। प्रकृति के इस चक्र में गिद्धों की भूमिका किसी सुपरहीरो से कम नही है। वे प्रकृति के सफाईकर्मी (Nature’s Cleanup Crew) है, जो बिना कोई सेलरी लिए हमारे पर्यावरण को साफ और बीमारी मुक्त रखते हैं।
1. पर्यावरण के लिए गिद्ध क्यों महत्वपूर्ण है?
किसी भी जंगल या ग्रामीण इलाके में जब कोई बड़ा जानवर मरता है, तो उसका विशाल शरीर सड़ने लगता है। यह सड़ता हुआ शरीर न केवल असहनीय बदबू छोड़ता करता है, बल्कि यह हवा और पानी को भी दूषित करता है।
गिद्ध इस समस्या को सबसे तेज़ और प्रभावी तरीके
से निपटाते हैं।
- तेज़ निपटान: गिद्धों का एक समूह एक भैंस के आकार के शव को केवल 30 मिनट के भीतर हड्डियों तक साफ कर सकता है।
- प्राकृतिक रिसाइकिलिंग: वे मृत कार्बनिक पदार्थों (Dead Organic Matter) को खाकर उन्हें वापस प्रकृति के पोषक चक्र में मिला देते हैं।
अगर गिद्ध न हों, तो यह काम बैक्टीरिया और कीड़ों को करना पड़ेगा, जिसमें हफ्तों या महीनों लग सकते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा बना रहेगा।
2. महामारियों से रक्षा (Disease Control Barrier)
यह गिद्धों की सबसे महत्वपूर्ण और बेजोड़ विशेषता है। गिद्धों का पाचन तंत्र (Digestive System) इतना मजबूत होता है कि वे उन खतरनाक जीवाणुओं को भी पचा सकते हैं जो इंसानों या अन्य जानवरों के लिए जानलेवा होते हैं।
- डेड-एंड होस्ट (Dead-end Host): जब गिद्ध किसी संक्रमित शव को खाते हैं, तो एंथ्रेक्स (Anthrax), हैजा (Cholera) और बोटुलिज़्म (Botulism) जैसे बैक्टीरिया उनके पेट के एसिड में नष्ट हो जाते हैं। वे इन बीमारियों को आगे नहीं फैलाते।
- अन्य जानवरों से तुलना: अगर गिद्ध शव नहीं खाते, तो आवारा कुत्ते उसे खाते हैं। कुत्ते इन बैक्टीरिया को पचा नहीं पाते और वे बीमारी के वाहक बन जाते हैं, जिससे ये बीमारियां इंसानी बस्तियों तक पहुँच सकती हैं।
3. आवारा कुत्तों और रेबीज पर नियंत्रण
भारत में गिद्धों की आबादी कम होने का सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर पड़ा है। 1990 के दशक में जब भारत में गिद्धों की संख्या में 99% की गिरावट आई, तो मृत मवेशियों के ढेर लगे रहने लगे।
- भोजन की उपलब्धता: शवों की अधिकता के कारण आवारा कुत्तों को आसानी से भोजन मिलने लगा, जिससे उनकी जनसंख्या में विस्फोट हुआ।
- रेबीज का खतरा: कुत्तों की बढ़ती आबादी के साथ रेबीज (Rabies) के मामलों में भारी वृद्धि हुई। एक शोध के अनुसार, भारत में गिद्धों के गायब होने से कुत्तों के काटने और रेबीज से होने वाली मौतों के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर अरबों रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा है।
4. गिद्ध संकट और डाइक्लोफेनाक (The Vulture Crisis)
आज गिद्ध गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) श्रेणी में आते हैं। इसका मुख्य कारण एक दर्द निवारक दवा है – डाइक्लोफेनाक (Diclofenac)।
यह दवा बीमार पशुओं को दर्द कम करने के लिए दी जाती थी। जब इन पशुओं की मृत्यु हो जाती थी और गिद्ध उनके मांस को खाते थे, तो दवा का अंश गिद्धों के शरीर में पहुँच जाता था। गिद्धों के गुर्दे (Kidneys) बहुत संवेदनशील होते हैं और इस दवा के कारण वे फेल हो जाते थे, जिससे उनकी दर्दनाक मौत होती थी।
खुशी की बात यह है कि भारत सरकार ने पशु चिकित्सा में डाइक्लोफेनाक के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन अभी भी चोरी-छिपे इसका इस्तेमाल रोकना एक चुनौती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
गिद्ध केवल एक पक्षी नही है, बल्कि वे हमारे इकोसिस्टम की सुरक्षा प्रणाली है। उनका होना इस बात का संकेत है कि हमारा पर्यावरण स्वस्थ है। एक प्रकृति प्रेमी होने के नाते, यह हमारा कर्तव्य है कि हम समाज को समझाएं कि गिद्ध क्यों महत्वपूर्ण है और उनके प्रति फैले भ्रम व अफवाहों को दूर करें। हमें गिद्धों को बचाने के लिए संरक्षण केंद्रों (Conservation Centers) का समर्थन करना चाहिए और रसायनों के दुष्प्रभावो के प्रति जागरूकता फैलानी चाहिए। याद रखें, गिद्ध बचेंगे, तभी हमारा पर्यावरण स्वच्छ और सुरक्षित रहेगा।
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