केंद्र सरकार का बड़ा फैसला: कुंभलगढ़ अभयारण्य अब Eco-Sensitive Zone घोषित, जानिए पर्यटन और स्थानीय लोगों के लिए क्या बदलेगा?

कुंभलगढ़ (राजस्थान): केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने राजस्थान के राजसमंद, उदयपुर और पाली जिलों में फैले कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य को आधिकारिक तौर पर इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित कर दिया है। जनवरी 2026 में जारी इस अधिसूचना का उद्देश्य अरावली की पहाड़ियों की नाजुक इकोसिस्टम को बचाना और वन्यजीवों के लिए एक सुरक्षित काॅरिडोर तैयार करना है।

इस बड़े फैसले के बाद अभयारण्य के आसपास के 1 किलोमीटर के दायरे में अब काॅमर्शियल माइनिंग और बड़े निमार्ण कार्यो पर पूरी तरह रोक लग जाएगी। आइए जानते हैं कि इस नोटिफिकेशन की बड़ी बातें क्या है और इसका स्थानीय लोगों व पर्यटकों पर क्या असर पड़ेगा।

क्या है अधिसूचना की मुख्य बातें?

नई अधिसूचना के अनुसार, कुंभलगढ़ अभयारण्य की सीमा से 0 से 1 किलोमीटर तक का क्षेत्र अब इको-सेंसिटिव ज़ोन (Eco-Sensitive Zone) माना जाएगा।

  • कुल क्षेत्रफल: लगभग 243 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र इस जोन के दायरे में आएगा।
  • प्रभावित गांव: इस परिधि में तीन जिलों (राजसमंद, पाली, उदयपुर) के करीब 94 गांव शामिल हैं।
  • मकसद: इसका मुख्य उद्देश्य अभयारण्य के आसपास हो रहे अनियंत्रित औद्योगिकीकरण और खनन को रोकना है, जो यहाँ के लेपर्ड और भविष्य में आने वाले बाघों के आवास के लिए खतरा बन रहे थे।

क्या बंद होगा और क्या चालू रहेगा?

ब्लॉगर्स और पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह जानना सबसे जरूरी है कि ESZ का मतलब “विकास पर ताला” नहीं, बल्कि “नियंत्रित विकास” होता है। सरकार ने गतिविधियों को तीन श्रेणियों में बांटा है:

1. पूरी तरह प्रतिबंधित

  • खनन: इस जोन में किसी भी प्रकार का व्यावसायिक खनन (Commercial Mining) नहीं होगी।
  • नए उद्योग: प्रदूषण फैलाने वाले नए कारखाने नहीं लगाए जा सकेंगे।
  • बड़े होटल/रिसॉर्ट: अभयारण्य की सीमा से 1 किमी के भीतर नए बड़े होटल या रिसॉर्ट बनाने की अनुमति नहीं होगी।
  • अन्य: आरा मशीनें (Saw Mills), ईंट-भट्टे और जल स्रोतों में गंदा पानी छोड़ने पर सख्त पाबंदी होगी।

2. विनियमित गतिविधियां अनुमति के साथ

  • होटल/इको-टूरिज्म: पहले से चल रहे होटल चलते रहेंगे, लेकिन नए निर्माण के लिए मास्टर प्लान के तहत अनुमति लेनी होगी।
  • पेड़ काटना: बिना अनुमति के पेड़ों की कटाई नहीं होगी।
  • बुनियादी ढांचा: बिजली के तार, सड़क चौड़ीकरण आदि के लिए वन विभाग और निगरानी समिति की मंजूरी जरूरी होगी।

3. अनुमति प्राप्त:

  • स्थानीय आवास: स्थानीय ग्रामीण अपने रहने के लिए घर बना सकते हैं या मरम्मत कर सकते हैं। इस पर कोई रोक नहीं है।
  • कृषि: जैविक खेती, बागवानी और पशुपालन को बढ़ावा दिया जाएगा।
  • कुटीर उद्योग: बांस और लकड़ी से बने स्थानीय हस्तशिल्प को प्रोत्साहित किया जाएगा।

वन्यजीवों के लिए क्यों है यह संजीवनी?

कुंभलगढ़ का जंगल न केवल लेपर्ड और भेड़ियों का घर है, बल्कि यह रणथंभौर और मुकुंदरा हिल्स के बीच बाघों की आवाजाही का एक महत्वपूर्ण गलियारा (Corridor) भी है। बीते कुछ समय से कुंभलगढ़ को “टाइगर रिजर्व” बनाने की मांग भी जोर पकड़ रही है। ऐसे में Eco-Sensitive Zone घोषित होना इस दिशा में पहला बड़ा कदम है। इससे मानवीय दखल कम होगा और वन्यजीवों को शिकार और शोर-शराबे से मुक्ति मिलेगी। यह क्षेत्र अरावली पर्वतमाला का हिस्सा है, जो थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकने में प्राकृतिक दीवार का काम करता है।

स्थानीय लोगों और पर्यटन पर प्रभाव

शुरुआत में इस अधिसूचना को लेकर स्थानीय ग्रामीणों में डर था कि उनकी आजीविका छिन जाएगी, लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया है कि “हैंड्स-ऑफ एप्रोच” नहीं अपनाई जाएगी।

  • पर्यटन: इको-टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा। होम-स्टे (Home-stays) और नेचर गाइड जैसे रोजगार बढ़ेंगे।
  • ज़ोनल मास्टर प्लान: राज्य सरकार को अब 2 साल के भीतर एक ‘ज़ोनल मास्टर प्लान’ तैयार करना होगा। इसमें स्थानीय लोगों की राय भी ली जाएगी ताकि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकें।

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