इंदौर की नई उड़ान: ‘स्वच्छता के शहर’ में 9 साल बाद हुई सफेद गिद्धों की वापसी, देवगुराड़िया बना गवाह

लगातार कई सालों से देश के “सबसे साफ शहर” का ताज पहने इंदौर ने अब केवल शहरी प्रबंधन ही नहीं, बल्कि इकोलॉजिकल रिस्टोरेशन में भी एक नई मिसाल कायम की है। शहर के देवगुराड़िया ट्रेंचिंग ग्राउंड, जिसे कभी कचरे के पहाड़ों और उससे उठने वाले जहरीले धुएं के लिए जाना जाता था, अब वहां पर एक अनोखा बदलाव देखा गया है। एक हालिया सर्वे के अनुसार, यहाॅं लगभग 9 सालों के लंबे अंतराल के बाद लुप्तप्राय प्रजाति, मिस्र के गिद्ध (Egyptian Vulture), जिन्हें आम भाषा मे ‘सफेद गिद्ध’ भी कहा जाता है, उनकी वापसी हुई है।

कचरे के ढेर से ‘सिटी फॉरेस्ट’ तक का सफर

देवगुराड़िया में गिद्धों की यह वापसी कोई संयोग नहीं है, बल्कि यह इंदौर नगर निगम द्वारा किए गए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के प्रयासों का सीधा परिणाम है। एक दशक पहले तक, यह स्थान शहर भर के कचरे का डंपिंग यार्ड था। यहाँ मीथेन गैस के रिसाव के कारण अक्सर आग लगती थी और हवा में विषैलेपन का स्तर इतना अधिक था कि न केवल इंसानों, बल्कि पक्षियों का भी यहाँ रहना मुश्किल था।

नगर निगम ने ‘बायो-माइनिंग’ (Bio-mining) तकनीक का उपयोग करके लाखों टन पुराने कचरे का निस्तारण किया। कचरे के पहाड़ों को समतल कर वहां एक घना ‘सिटी फॉरेस्ट’ विकसित किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि कचरे के हट जाने और हरियाली के बढ़ने से क्षेत्र के तापमान और वायु गुणवत्ता में सुधार हुआ है। इसी शुद्ध वातावरण ने इन ‘आकाश के रक्षकों’ को वापस लौटने का निमंत्रण दिया है।

कौन हैं ये ‘सफेद गिद्ध’ और क्यों खास है इनकी वापसी?

मिस्र के गिद्ध भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाने वाले गिद्धों की प्रजातियों में सबसे छोटे होते हैं। इनका रंग मटमैला सफेद और चेहरा पीला होता है। आईयूसीएन (IUCN) की रेड लिस्ट में इन्हें ‘लुप्तप्राय’ (Endangered) श्रेणी में रखा गया है।

इकोसिस्टम में गिद्धों की भूमिका ‘सफाईकर्मियों’ की होती है। ये मरे हुए जानवरों को खाकर प्रकृति को साफ रखते हैं और एंथ्रेक्स, रेबीज व हैजा जैसी गंभीर बीमारियों को फैलने से रोकते हैं। 1990 के दशक में मवेशियों को दी जाने वाली दर्द निवारक दवा ‘डायक्लोफेनाक’ के कारण भारत में गिद्धों की 99% आबादी खत्म हो गई थी। ऐसे में, इंदौर जैसे शहरी क्षेत्र के पास इनकी कॉलोनी का दोबारा पनपना जैव विविधता के लिए एक ‘शुभ संकेत’ है।

सर्वे ने क्या खुलासा किया?

देवगुराड़िया और उसके आसपास के क्षेत्रों में किए गए पक्षी सर्वेक्षण के दौरान इन गिद्धों के कई जोड़े देखे गए हैं। सर्वे करने वाले विशेषज्ञों ने बताया कि गिद्ध बहुत ही संवेदनशील पक्षी होते हैं। वे केवल उन्हीं स्थानों पर अपना डेरा जमाते हैं जहाँ उन्हें भोजन की उपलब्धता के साथ-साथ ऊंचे पेड़ों या सुरक्षित चट्टानों पर रहने की जगह मिले और मानवीय हस्तक्षेप कम हो। 9 साल पहले तक यहाँ की विषैले परिस्थितियों ने उन्हें पलायन करने पर मजबूर कर दिया था, लेकिन अब ट्रेंचिंग ग्राउंड का बदला हुआ स्वरूप उन्हें रास आ रहा है।

अन्य शहरों के लिए सीख

इंदौर की यह उपलब्धि देश के अन्य महानगरों के लिए एक केस स्टडी है। यह बताती है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। आमतौर पर माना जाता है कि शहरीकरण वन्यजीवों को शहर से बाहर खदेड़ देता है, लेकिन इंदौर ने दिखाया है कि अगर हम अपनी गंदगी को सही तरीके से साफ करें, तो वन्यजीव हमारे बीच वापस लौट सकते हैं।

देवगुराड़िया अब केवल कचरा प्रबंधन का मॉडल नहीं रहा, बल्कि यह एक उभरता हुआ ईको-टूरिज्म स्पॉट और पक्षी विहार बनने की ओर अग्रसर है। मिस्र के गिद्धों की यह उड़ान उम्मीद की वह किरण है जो बताती है कि प्रकृति को अगर थोड़ा सा भी सहयोग मिले, तो वह खुद को ठीक करने की अद्भुत क्षमता रखती है। अब चुनौती यह है कि इस सुधरे हुए वातावरण को निरंतर बनाए रखा जाए ताकि ये मेहमान पक्षी हमेशा के लिए यहाँ बस सकें।


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