विलुप्ति की कगार पर खड़ी इस बिल्ली को बचाने की जंग: मेल कैराकल को लगा रेडियो काॅलर, अब पल-पल की मिलेगी खबर

भारत के वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। लुप्तप्राय प्रजातियों को बचाने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए, वन विभाग ने देश की सबसे दुर्लभ जंगली बिल्लियों में से एक, कैराकल की सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। हाल ही में एक वयस्क मेल कैराकल को सफलतापूर्वक पकड़कर उसे रेडियो ट्रैकींग काॅलर पहनाया गया है। इस कदम के बाद अब वन विभाग की टीम 24 घंटे इस दुर्लभ जीव की हर हरकत पर नजर रख सकेगी।

तकनीक और संरक्षण

कैराकल एक ऐसा जीव है जो अपनी फुर्ती और इंसानों की नजरों से ओझल रहने की आदत के लिए जाना जाता है। घने जंगलों या कटीली झाड़ियों के बीच रहने वाली इस बिल्ली को ट्रैक करना पारंपरिक तरीकों से लगभग असंभव था।

रेडियो ट्रैकिंग कॉलर कैसे काम करेगा?

यह कॉलर जीपीएस (GPS) तकनीक से लैस है, जो हर कुछ मिनटों में सैटेलाइट के माध्यम से कैराकल की सटीक लोकेशन वन विभाग के सर्वर पर भेजता रहेगा।

  1. 24/7 निगरानी: अब अधिकारी अपने डेस्कटॉप या मोबाइल पर देख पाएंगे कि कैराकल कहाँ घूम रहा है।
  2. शिकार और आहार की जानकारी: इसकी लोकेशन से यह पता चलेगा कि वह किस क्षेत्र में अधिक समय बिता रहा है, जिससे उसके शिकार के पैटर्न का विश्लेषण किया जा सकेगा।
  3. मानव-वन्यजीव संघर्ष पर लगाम: यदि कैराकल अनजाने में जंगल की सीमा पार कर किसी रिहायशी इलाके की ओर बढ़ता है, तो वन विभाग को तुरंत ‘वार्निंग’ मिल जाएगी, जिससे संभावित टकराव को टाला जा सकेगा।

कैराकल कैट के अस्तित्व पर संकट

कैराकल, जिसे हिंदी में ‘सियहगोश’ (Siyahgosh) भी कहा जाता है, अपनी शारीरिक बनावट के कारण दुनिया भर के वन्यजीव प्रेमियों के बीच आकर्षण का केंद्र है। इसके कानों के ऊपर लंबे काले बालों के गुच्छे और इसकी ऊंची छलांग (करीब 10 फीट तक) इसे अन्य जंगली बिल्लियों से अलग बनाती है।

भारत में, कैराकल मुख्य रूप से राजस्थान के रणथंभौर और गुजरात के कच्छ जैसे अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाए जाते हैं। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में इनकी संख्या में भारी गिरावट आई है। आवास का विनाश (Habitat Loss), शहरीकरण और अवैध शिकार ने इन्हें विलुप्ति की कगार पर खड़ा कर दिया है। वर्तमान में इसे भारत की ‘गंभीर रूप से लुप्तप्राय’ (Critically Endangered) प्रजातियों की सूची में शामिल करने की प्रक्रिया चल रही है।

इस प्रोजेक्ट का व्यापक उद्देश्य

मेल कैराकल को रेडियो कॉलर लगाना केवल एक जानवर की निगरानी तक सीमित नहीं है। वन विभाग और वैज्ञानिकों की इसके पीछे एक बड़ी योजना है

  • डेटा कोलेक्शन: कैराकल की टेरिटरी (इलाके) की सीमा कितनी बड़ी होती है? वे एक दिन में कितनी दूरी तय करते हैं? इन सवालों के जवाब अब वैज्ञानिक डेटा के आधार पर मिल सकेंगे।
  • प्रजनन और कुनबे की वृद्धि: मेल कैराकल की मूवमेंट से अन्य फीमेल कैराकल के ठिकानों का पता लगाना आसान होगा, जिससे भविष्य में उनके संरक्षण और प्रजनन कार्यक्रमों (Breeding Programs) को बल मिलेगा।
  • इकोसिस्टम की समझ: कैराकल जैसे ‘टॉप प्रीडेटर’ की मौजूदगी यह दर्शाती है कि उस जंगल का इकोसिस्टम स्वस्थ है

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