कोयंबटूर: तमिलनाडु के कोयंबटूर जिलें में स्थित मरुधमलाई की तलहटी इन दिनों मानव-हाथी संघर्ष का एक ऐसा केंद्र बन गया है, जहाॅं जंगल और बस्तियों के बीच की लकीर धुंधली होती जा रही है। मद्रास उच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान तमिलनाडु वन विभाग ने जो आंकड़े पेश किए हैं, वे न केवल चौंकाने वाले हैं बल्कि भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है। वन विभाग के अनुसार, साल 2025 के शुरूआती महिनों में ही जंगली हाथियों ने मरुधमलाई और उसके आसपास के रिहायशी इलाकों में 119 बार घुसपैठ की है। यह आंकड़ा इस क्षेत्र में रहने वाले हजारों लोगों की सुरक्षा और इकोलॉजिकल संतुलन पर बड़े सवालिया निशान खड़े करता है।
संघर्ष की पृष्ठभूमि और बढ़ती घटनाएं
कोयंबटूर का पश्चिमी घाट क्षेत्र हाथियों का प्राकृतिक गलियारा (Elephant Corridor) रहा है। मरुधमलाई मंदिर की पहाड़ियाँ और उनसे सटे भारतीयार विश्वविद्यालय और अन्ना विश्वविद्यालय के कैंपस अब हाथियों के लिए नियमित विचरण का मैदान बन चुके हैं। अदालत को दी गई जानकारी के अनुसार, हाथियों के झुंड न केवल रात के अंधेरे में बल्कि अब दिन के उजाले में भी रिहायशी इलाकों, छात्रावासों और कृषि क्षेत्रों में देखे जा रहे हैं।
विभाग ने बताया कि 119 बार हुई इन घुसपैठों में कई बार हाथियों ने फसलों को भारी नुकसान पहुँचाया है और घरों की दीवारों को क्षतिग्रस्त किया है। यह संघर्ष केवल संपत्ति के नुकसान तक सीमित नहीं है, इसने स्थानीय निवासियों के मन में एक मनोवैज्ञानिक खौफ पैदा कर दिया है। शाम ढलते ही लोग घरों से बाहर निकलने में डरते हैं, और क्षेत्र के शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
अतिक्रमण और गलियारों का संकट
अदालत की कार्यवाही के दौरान न्यायमूर्ति ने वन विभाग और जिला प्रशासन से कड़े सवाल पूछे। इस संकट का सबसे प्रमुख कारण हाथियों के पारंपरिक रास्तों में हुआ अनियंत्रित निर्माण बताया जा रहा है। मरुधमलाई की तलहटी में बीते दो दशकों में तेजी से रियल एस्टेट और शैक्षणिक संस्थानों का विकास हुआ है। जहाँ कभी घने जंगल और हाथियों के चलने के रास्ते थे, वहाँ आज कंक्रीट की दीवारें खड़ी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि हाथी अपनी याददाश्त के लिए जाने जाते हैं। वे पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हीं रास्तों का उपयोग करते हैं जिन्हें उनके पूर्वजों ने चुना था। जब इन रास्तों पर कोई इमारत या बाड़ लगा दी जाती है, तो हाथी भ्रमित होकर बस्तियों की ओर मुड़ जाते हैं। वन विभाग की रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि जंगल के भीतर पानी के स्रोतों का सूखना और आक्रामक खरपतवारों (जैसे लैंटाना कमारा) का फैलना भी हाथियों को भोजन की तलाश में बाहर आने पर मजबूर कर रहा है।
वन विभाग की रणनीति और तकनीकी हस्तक्षेप
बढ़ते दबाव के बीच, वन विभाग ने अदालत को अपनी कार्ययोजना से अवगत कराया है। विभाग ने स्वीकार किया कि पारंपरिक तरीके, जैसे कि ढोल बजाना या पटाखे फोड़ना, अब हाथियों पर बेअसर साबित हो रहे हैं। इसके बजाय, विभाग अब ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) और ‘थर्मल सेंसर’ आधारित निगरानी प्रणाली पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
- अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS): मरुधमलाई और आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों में AI-कैमरे लगाए जा रहे हैं जो हाथियों की आवाजाही को तुरंत भांप लेते हैं। हाथी के बस्ती की ओर बढ़ने पर यह सिस्टम स्थानीय लोगों और वन कर्मियों के मोबाइल पर तुरंत अलर्ट भेजता है।
- हाथी रोधी खाइयां: सरकार ने कई किलोमीटर लंबी नई खाइयों के निर्माण और पुरानी खाइयों की मरम्मत के लिए बजट आवंटित किया है। हालांकि, ढलान वाले इलाकों में ये खाइयां अक्सर मिट्टी भरने के कारण बेकार हो जाती हैं।
- कुम्की हाथियों की तैनाती: संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए वन विभाग ने प्रशिक्षित ‘कुम्की’ हाथियों (पालतू हाथी जो जंगली हाथियों को खदेड़ने में मदद करते हैं) का उपयोग बढ़ा दिया है। इन्हें विशेष रूप से उन क्षेत्रों में तैनात किया जाता है जहाँ जंगली हाथियों का झुंड लंबे समय तक डेरा डाल लेता है।
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