विशेष रिपोर्ट: हाल ही में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Nature में प्रकाशित एक शोध ने दुनिया भर के पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है। शोध के अनुसार, अमेरिका में जलवायु परिवर्तन के कारण जंगलों में लगने वाली भीषण आग अब केवल पेड़ों और वन्यजीवों को ही नष्ट नहीं कर रही, बल्कि वायुमंडल में ‘नाइट्रोजन डिपोजिशन’ के स्तर को खतरनाक रूप से बढ़ा रही है। यह बदलाव प्राकृतिक इकोसिस्टम के मूलभूत रसायन विज्ञान को स्थायी रूप से बदल सकता है।
क्या है नाइट्रोजन डिपोजिशन का संकट?
साधारण शब्दों में, जब जंगल जलते हैं, तो सालों से पेड़ों, झाड़ियों और मिट्टी में संचित नाइट्रोजन धुएं के साथ वायुमंडल में मुक्त हो जाती है। यह नाइट्रोजन हवा में मौजूद अन्य तत्वों के साथ मिलकर सूक्ष्म कणों और गैसों का रूप ले लेती है। जब बारिश होती है या हवा चलती है, तो यह नाइट्रोजन वापस ज़मीन, नदियों और झीलों पर गिरती है।
अध्ययन के अनुसार, पिछले दो दशकों में पश्चिमी अमेरिका के कई हिस्सों में नाइट्रोजन के इस ‘निक्षेपण’ या जमाव में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पहले इस तरह के प्रदूषण का मुख्य कारण कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाले उर्वरक और वाहनों से निकलने वाला धुआं था, लेकिन अब जंगलों की आग एक “अनियंत्रित प्रदूषण स्रोत” के रूप में उभरी है।
इकोसिस्टम पर प्रभाव
नाइट्रोजन आमतौर पर पौधों के विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व माना जाता है, लेकिन इसकी अत्यधिक मात्रा ‘धीमे जहर’ की तरह काम करती है। जब वातावरण से अत्यधिक नाइट्रोजन मिट्टी में गिरती है, तो यह मिट्टी के पीएच (pH) संतुलन को बिगाड़ देती है, जिससे मिट्टी “acidic” हो जाती है।
इसका सबसे विनाशकारी प्रभाव जैव विविधता पर पड़ता है। कई स्थानीय पौधे जो कम नाइट्रोजन वाली मिट्टी में पनपते हैं, वे खत्म होने लगते हैं। उनकी जगह ऐसी आक्रामक प्रजातियाँ ले लेती हैं जिन्हें नाइट्रोजन बहुत पसंद है। यह न केवल वनस्पतियों को बदल देता है, बल्कि उन पर निर्भर कीटों और जानवरों के अस्तित्व को भी संकट में डाल देता है।
जल प्रदूषण और मृत क्षेत्र
हवा से गिरने वाली यह नाइट्रोजन जब जल निकायों तक पहुँचती है, तो यह ‘यूट्रोफिकेशन’ (Eutrophication) की प्रक्रिया को जन्म देती है। झीलों और नदियों में नाइट्रोजन की अधिकता के कारण ‘शैवाल’ (Algae) का अनियंत्रित विकास होने लगता है। यह हरी परत पानी की सतह को ढक लेती है, जिससे सूरज की रोशनी नीचे नहीं पहुँच पाती और पानी में ऑक्सीजन का स्तर गिर जाता है। परिणाम स्वरूप, मछलियाँ और अन्य जलीय जीव दम तोड़ने लगते हैं, जिससे स्वच्छ जल के स्रोत ‘मृत क्षेत्र’ में बदल जाते हैं।
जलवायु परिवर्तन के साथ खतरनाक संबंध
यह अध्ययन एक डरावने ‘फीडबैक लूप’ की ओर इशारा करता है। जैसे-जैसे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है, गर्मी और सूखे की अवधि लंबी होती जा रही है। सूखे जंगल आग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। जब ये जंगल जलते हैं, तो वे न केवल नाइट्रोजन बल्कि भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड भी छोड़ते हैं। यह कार्बन डाइऑक्साइड ग्लोबल वार्मिंग को और तेज करती है, जिससे फिर से जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह शोध उन नीतियों के लिए एक चेतावनी है जो केवल शहरों के प्रदूषण पर ध्यान केंद्रित करती हैं। अब यह स्पष्ट है कि शहरों से दूर जलने वाले जंगल भी हमारे पर्यावरण और स्वास्थ्य पर वैसा ही बुरा असर डाल रहे हैं जैसा कि भारी उद्योग। धुएं के साथ उड़ने वाले ये सूक्ष्म कण सैकड़ों मील का सफर तय करके घनी आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुँच रहे हैं, जिससे सांस संबंधी बीमारियाँ भी बढ़ रही हैं।
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