दिल्ली-NCR में मार्च के महिने में सामान्य से अधिक तापमान के बीच छाई धुंध, मौसम वैज्ञानिकों ने जताई चिंता

दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र “एनसीआर” में इन दिनों मौसम का एक बेहद अजीब और दुर्लभ पैटर्न देखने को मिल रहा है। मार्च के महिने में, जहां आमतौर पर होली के आसपास हल्की गर्मी की शुरुआत होती है और आसमान साफ रहता है, वहीं इस बार दिल्ली-एनसीआर एक घनी धुंध की चादर में लिपटा हुआ है। सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि यह धुंध कम तापमान वाली “धुंध” नहीं है, बल्कि यह सामान्य से 3 से 5 डिग्री अधिक तापमान के बीच छाई हुई है।

अचानक आए इस बदलाव के कारण न केवल आम जनता को परेशानी हुई, बल्कि पर्यावरण विशेषज्ञों और मौसम वैज्ञानिकों को भी गहरी चिंता में डाल दिया है। सड़कों पर सुबह और शाम के समय विजिबिलिटी कम दर्ज की जा रही है, जो आमतौर पर नवंबर या दिसंबर के महिनों में होती है।

मार्च में “दिसंबर जैसा” नजारा: क्या है कारण?

मौसम विभाग (IMD) के आंकड़े के अनुसार, मार्च के पहले और दूसरे हफ्ते में दिल्ली का अधिकतम तापमान सामान्य से काफी ऊपर बना हुआ है। कई इलाकों में पारा 32 से 34 डिग्री सेल्सियस के पार जा चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस “होट हेज” के पीछे कई भौगोलिक और वायुमंडलीय कारक जिम्मेदार हो सकते हैं।

  1. हवा की गति में भारी गिरावट: धुंध छाने का सबसे बड़ा कारण हवा की गति का अचानक धीमा पड़ना है। जब हवा स्थिर हो जाती है, तो स्थानीय स्तर पर उत्पन्न प्रदूषक तत्व और धूल के कण वायुमंडल की निचली सतह पर ही जमा हो जाते हैं। उच्च तापमान की स्थिति में ये कण नमी के साथ मिलकर एक धुंधली परत बना लेते हैं।
  2. पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव: उत्तर भारत के पहाड़ी इलाकों में सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ के कारण मैदानी इलाकों में नमी का स्तर बढ़ रहा है। आमतौर पर विक्षोभ बारिश लाता है, लेकिन इस बार यह केवल बादलों और नमी तक ही सीमित रहा, जिससे उमस और धुंध का मिला-जुला असर दिख रहा है।
  3. थर्मल इन्वर्जन: विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे “थर्मल इन्वर्जन” की स्थिति से जोड़कर देख रहा है। इसमें जमीन के पास की गर्म हवा ऊपर की ठंडी हवा की परत के नीचे दब जाती है, जिससे प्रदूषक बाहर नहीं निकल पाते और शहर एक गैस चैंबर जैसा दिखने लगता है।

पर्यावरण विशेषज्ञों की चेतावनी

पर्यावरणविदों का कहना है कि मार्च में इस तरह की धुंध जलवायु परिवर्तन का एक स्पष्ट संकेत है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, “मार्च में धुंध का होना यह दर्शाता है कि हमारा स्थानीय इकोसिस्टम बुरी तरह प्रभावित हो चुका है। धूल के महीन कण (PM 2.5 और PM 10) इस समय हवा में बहुत अधिक मात्रा में मौजूद हैं।”

इस धुंध के कारण दिल्ली-एनसीआर का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) भी “खराब” श्रेणी में बना हुआ है। मार्च के महिने में जब पेड़ों पर नई पत्तियां आती है और प्रकृति खिलती है, तब इस तरह का प्रदूषण पौधों के सांस लेने के चक्र को भी प्रभावित कर सकता है।

स्वास्थ्य पर पड़ रहा है सीधा असर

अस्पतालों में सांस के मरीजों की संख्या में अचानक बढ़ोतरी देखी जा रही है। डाॅक्टरो का कहना है कि उच्च तापमान और धुंध का यह मिश्रण उन लोगों के लिए घातक है जिन्हें अस्थमा या ब्रोंकाइटिस की समस्या है। धुंध में मौजूद सूक्ष्म कण फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश कर रहे हैं, जिससे खांसी, गले में खराश और आंखों में जलन जैसी शिकायतें आम हो गई है।

विषेश रूप से सुबह की सैर पर जाने वाले बुजुर्गो और स्कूल जाने वाले बच्चों को सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक हवा की गति तेज नहीं होती, तब तक इस धुंध से राहत मिलने की उम्मीद कम ही है।

खेती और फसलों पर संकट

इस असामान्य मौसम का असर केवल शहरी जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों और खेती पर भी इसका असर पड़ रहा है। मार्च का महीना रबी की फसलों, विशेषकर गेहूं की कटाई के करीब का समय होता है। अधिक तापमान और धुंध के कारण फसलों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहा और धुंध बनी रही, तो गेहूं के दाने समय से पहले सूख सकते हैं, जिससे पैदावार में कमी आने की आशंका है।

भविष्य की चुनौतियाॅं और प्रशासन की भूमिका

दिल्ली सरकार और पड़ोसी राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। धूल नियंत्रण के लिए एंटी-स्माॅग गन का उपयोग फिर से शुरू करने पर विचार किया जा रहा है।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तात्कालिक उपाय पर्याप्त नहीं है। शहरीकरण के कारण बढ़ते “कंक्रीट जंगल” और कम होती हरीयाली मार्च जैसे महीनों को भी “प्रदूषण का महीना” बना रही है।

अगर आने वाले दिनों में बारिश नहीं होती है, तो यह धुंध और गहरी हो सकती है। फिलहाल, मौसम विभाग ने अगले 48 घंटों में हल्की बूंदाबांदी की संभावना जताई है, जिससे शायद वातावरण कुछ हद तक साफ हो सके। लेकिन बड़ा सवाल अभी भी खड़ा है, क्या हम एक ऐसे भविष्य की तरफ बढ़ रहे हैं जहाॅं दिल्ली-एनसीआर में साल के 12 महीने धुंध और प्रदूषण का साया बना रहेगा?


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