आज 2 मई 2026 को पूरी दुनिया “विश्व ट्यूना दिवस” मना रही है। यह दिन न केवल इस शानदार समुद्री जीव के महत्व को रेखांकित करता है, बल्कि यह इंसानों और प्रकृति के बीच के उस नाजुक संतुलन की कहानी भी कहता है, जिसमें एक तरफ बड़ी जीत हुई है तो दूसरी तरफ एक बहुत बड़ा संकट दस्तक दे रहा है। हाल ही में आई वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार, ट्यूना मछलियां वर्षों के भीषण अस्तित्व संकट से तो बाहर निकल आई हैं, लेकिन अब ‘जलवायु परिवर्तन’ उनके भविष्य के लिए एक नई चुनौती बनकर सामने आ रहा है।
ट्यूना: सिर्फ एक मछली नहीं, पोषण का खजाना
ट्यूना मछली को दुनिया भर के होटलों और घरों में काफी पसंद किया जाता है। स्वाद के अलावा, यह पोषक तत्वों का एक पावरहाउस है। इसमें प्रचुर मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड, उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, विटामिन बी12 और सेलेनियम जैसे खनिज पाए जाते हैं। यह वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए इतनी महत्वपूर्ण है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2016 में आधिकारिक तौर पर इसके संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए 2 मई को विश्व ट्यूना दिवस घोषित किया था।
विनाश के कगार से वापसी का सफर
एक समय था जब ट्यूना की प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर थीं। साल 2017 तक केवल 75% ट्यूना भंडार ही सुरक्षित माने जाते थे। अंधाधुंध शिकार (Overfishing) और अंतरराष्ट्रीय नियमों की कमी ने इसकी आबादी को बुरी तरह प्रभावित किया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक चमत्कारिक बदलाव देखा गया है।
वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, आज दुनिया की लगभग 99% ट्यूना मछली उन स्रोतों से आ रही है जिन्हें वैज्ञानिक रूप से ‘सुरक्षित’ और ‘टिकाऊ’ माना जाता है। दुनिया के 23 प्रमुख ट्यूना भंडारों में से अब केवल दो ही ऐसे बचे हैं जहाँ अत्यधिक शिकार की समस्या है। “अटलांटिक ब्लूफिन ट्यूना” की वापसी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो अब इंग्लैंड और आयरलैंड के तटों पर फिर से देखी जा रही है। यह सफलता वैश्विक सहयोग, सख्त कोटा प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी (E-monitoring) का परिणाम है।
जलवायु परिवर्तन: एक नया और अदृश्य संकट
जहाँ इंसानों ने नियमों के जरिए ट्यूना को जाल से तो बचा लिया, वहीं अब समुद्र के बढ़ते तापमान ने उनकी पूरी दुनिया उलट-पुलट कर दी है। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र गर्म हो रहे हैं, जिससे ट्यूना मछलियों के प्रवास (Migration) के रास्ते बदल रहे हैं।
ट्यूना अब ठंडे पानी की तलाश में अपने पारंपरिक इलाकों को छोड़कर गहरे और दूरदराज के समुद्री क्षेत्रों की ओर पलायन कर रही हैं। इसका सीधा असर छोटे मछुआरों पर पड़ रहा है। उन्हें अब मछली पकड़ने के लिए समुद्र में बहुत दूर तक जाना पड़ता है, जिससे उनकी ईंधन की लागत बढ़ रही है और जोखिम भी। कई द्वीपीय देशों के लिए, जिनकी अर्थव्यवस्था ट्यूना पर टिकी है, यह एक आर्थिक आपदा जैसा है।
‘बायकैच’ की अनसुलझी चुनौती
ट्यूना पकड़ने के लिए बिछाए गए बड़े जालों में अक्सर शार्क और समुद्री कछुए जैसे समुद्री जीव गलती से फंस जाते हैं। हालांकि ट्यूना के संरक्षण के लिए नियम बने हैं, लेकिन बायकैच की वजह से समुद्री इकोसिस्टम का संतुलन अब भी डगमगाया हुआ है। विशेष रूप से शार्क की कई प्रजातियां इस वजह से खतरे में हैं।
भविष्य की राह: तकनीकी और अंतरराष्ट्रीय संधियां
इस संकट से निपटने के लिए दुनिया अब नई तकनीकों और संधियों की ओर देख रही है। खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) का “कॉमन ओशियंस ट्यूना प्रोजेक्ट” मछुआरों को ऐसी तकनीकें सिखा रहा है जिससे बायकैच कम हो और मछली पालन टिकाऊ बना रहे।
इसके अलावा, साल 2026 में लागू हुई BBNJ (Biodiversity Beyond National Jurisdiction) संधि एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। यह संधि उन समुद्री क्षेत्रों की रक्षा करती है जो किसी एक देश के नियंत्रण में नहीं आते। इसका लक्ष्य 2030 तक दुनिया के 30% महासागरों को संरक्षित क्षेत्र घोषित करना है, जिससे ट्यूना जैसी प्रवासी मछलियों को सुरक्षित रास्ता मिल सके।
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