बार्डा वन्यजीव अभयारण्य: एशियाई शेरों का नया और सुरक्षित ठिकाना

गुजरात का गौरव कहे जाने वाले एशियाई शेरों के संरक्षण के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। सौराष्ट्र के पोरबंदर और देवभूमि द्वारका जिलों में स्थित बार्डा वन्यजीव अभयारण्य, अब गिर नेशनल पार्क के बाद शेरों का दूसरा आधिकारिक घर बन चुका है। दशकों से वन्यजीव प्रेमी और वैज्ञानिक इस बात पर जोर दे रहे थे कि शेरों की पूरी आबादी का केवल गिर के जंगलों में केंद्रित होना जोखिम भरा हो सकता है। ऐसे में बार्डा का उभरना इकोसिस्टम के लिए एक सुखद संकेत है।

143 साल का लंबा इंतजार हुआ खत्म

बार्डा के जंगलों में शेरों की दहाड़ करीब 143 साल बाद फिर से सुनाई दी है। ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, साल 1879 के बाद इस क्षेत्र में शेर नहीं देखे गए थे। हालांकि, जनवरी 2023 में एक युवा नर शेर ने प्राकृतिक रूप से गिर से करीब 100 किलोमीटर का सफर तय कर बार्डा में प्रवेश किया। इसके बाद से ही गुजरात वन विभाग ने इस क्षेत्र को शेरों के अनुकूल बनाने के लिए ‘प्रोजेक्ट लायन @ 2047’ के तहत विशेष तैयारी शुरू कर दी थी। आज, 2026 की शुरुआत तक यहाँ शेरों की संख्या बढ़कर 17 हो गई है, जिसमें कुछ नए शावकों का जन्म भी शामिल है।

बार्डा की भौगोलिक और इकोलॉजिकल स्थिति

लगभग 192 वर्ग किलोमीटर में फैला बार्डा अभयारण्य अपनी पहाड़ियों, घने जंगलों और घास के मैदानों के लिए जाना जाता है। इसकी इकोलॉजी काफी हद तक गिर के जंगलों से मेल खाती है। यहाँ पाए जाने वाले खैर, बबूल और ढाक के पेड़ शेरों को छिपने और शिकार करने के लिए प्राकृतिक वातावरण प्रदान करते हैं।

वन विभाग ने शेरों के रहने योग्य परिस्थितियों को बेहतर बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं:

  • शिकार की उपलब्धता: शेरों के लिए पर्याप्त भोजन सुनिश्चित करने के लिए यहाँ बड़ी संख्या में चीतल, सांभर और नीलगाय जैसे शाकाहारी जानवरों को छोड़ा गया है।
  • जल संरक्षण: अभयारण्य के भीतर चेक डैम और पानी के कुंड बनाए गए हैं ताकि भीषण गर्मी के दौरान भी जानवरों को पानी की किल्लत न हो।
  • पशु चिकित्सा सुविधाएं: शेरों की स्वास्थ्य निगरानी के लिए स्थानीय स्तर पर चिकित्सा तंत्र को मजबूत किया गया है।

“प्रोजेक्ट लायन” और भविष्य की योजनाएं

केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त पहल ‘प्रोजेक्ट लायन’ का मुख्य उद्देश्य शेरों के आवास का विस्तार करना और उनकी आनुवंशिक विविधता को बचाए रखना है। गिर में शेरों की बढ़ती आबादी के कारण ‘इनब्रीडिंग’ और बीमारियों के फैलने का खतरा हमेशा बना रहता था। बार्डा एक ‘सेफ्टी वाल्व’ की तरह काम कर रहा है। यदि भविष्य में गिर में कोई महामारी फैलती है, तो बार्डा में मौजूद शेरों की आबादी इस प्रजाति को विलुप्त होने से बचा सकती है।

हाल ही में सरकार ने बार्डा को पर्यटन मानचित्र पर लाने के लिए 180 करोड़ रुपये से अधिक के बजट को मंजूरी दी है। इसके तहत यहाँ एक अत्याधुनिक सफारी पार्क विकसित किया जा रहा है, जिससे न केवल पर्यटन बढ़ेगा बल्कि स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

स्थानीय समुदायों की भूमिका

बार्डा की सफलता के पीछे वन विभाग के साथ-साथ स्थानीय ‘मालधारी’ समुदाय और ग्रामीणों का भी बड़ा हाथ है। यहाँ के लोग शेरों के साथ सह-अस्तित्व (Co-existence) की भावना रखते हैं। वन्यजीव प्रेमियों का मानना है कि बार्डा में शेरों का बसना केवल एक प्रजाति का संरक्षण नहीं है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र की जैव विविधता को पुनर्जीवित करने का एक जरिया है। बार्डा अब केवल एक अभयारण्य नहीं, बल्कि एशियाई शेरों के संरक्षण का वैश्विक मॉडल बनने की राह पर है।


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