रेगिस्तान शब्द सुनते ही हमारे मन में दूर-दूर तक फैली रेत, तेज धूप, पानी की कमी और कठिन जीवन की तस्वीर उभर आती है। आमतौर पर लोग मानते हैं कि रेगिस्तान हमेशा से ऐसे ही रहे होंगे, लेकिन सच्चाई यह है कि अधिकतर रेगिस्तान एक लंबी प्राकृतिक और मानवीय प्रक्रिया के परिणाम हैं। समय के साथ-साथ उपजाऊ या सामान्य भूमि भी रेगिस्तान में बदल सकती है। इस लेख में हम सरल भाषा में यह जानेंगे कि रेगिस्तान कैसे बनते है, वे क्या होते है, उनके पीछे कौन-कौन से कारण काम करते हैं और मानव गतिविधियाँ इस प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित करती हैं।
किस क्षेत्र को रेगिस्तान कहा जाता है?
रेगिस्तान वह भौगोलिक क्षेत्र होता है जहाँ पानी की उपलब्धता बहुत कम होती है और वर्षा अत्यंत सीमित रहती है। सामान्य रूप से जिस क्षेत्र में सालाना वर्षा 250 मिलीमीटर से कम होती है, उसे रेगिस्तानी क्षेत्र माना जाता है। कम बारिश के कारण वहाँ घनी वनस्पति विकसित नहीं हो पाती और भूमि धीरे-धीरे सूखी तथा बंजर होती चली जाती है। यह समझना भी ज़रूरी है कि रेगिस्तान केवल गर्म ही नहीं होते। कुछ रेगिस्तान बेहद ठंडे भी होते हैं, जहाँ तापमान शून्य से नीचे चला जाता है, लेकिन वहाँ भी वर्षा बहुत कम होती है।
रेगिस्तान कैसे बनते है?

रेगिस्तान बनने की प्रक्रिया अचानक नहीं होती। यह सैकड़ों या हजारों सालों में धीरे-धीरे विकसित होती है। शुरुआत आमतौर पर पानी की कमी से होती है, जो बाद में मिट्टी, वनस्पति और पूरे पर्यावरण को प्रभावित करती है। जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक बारिश नहीं होती, तो मिट्टी की नमी खत्म होने लगती है। पौधे कमजोर पड़ने लगते हैं और कुछ समय बाद पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। पेड़-पौधों के बिना मिट्टी खुली रह जाती है और हवा व तापमान के प्रभाव से उसका सूखना शुरू हो जाता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर रेगिस्तान के रूप में सामने आती है।
पर्वतों का वर्षा-छाया प्रभाव

पर्वत श्रेणियाँ भी रेगिस्तान बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब समुद्र से आने वाली नम हवाएँ किसी ऊँचे पर्वत से टकराती हैं, तो पर्वत के एक ओर बारिश होती है, वही दूसरी ओर पहुँचते-पहुँचते हवाएँ लगभग शुष्क हो जाती हैं।
ऐसे क्षेत्रों में:
- बादल नहीं बन पाते
- वर्षा नहीं होती
- भूमि धीरे-धीरे सूख जाती है
भारत का थार रेगिस्तान इसी वर्षा-छाया प्रभाव का एक अच्छा उदाहरण है, जहाँ अरावली पर्वतमाला एक प्राकृतिक बाधा का काम करती है।
पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति और
पृथ्वी पर कुछ जगहों पर रेगिस्तान अधिक पाए जाते हैं। लगभग 30 डिग्री उत्तर और 30 डिग्री दक्षिण के आसपास उच्च दबाव वाले क्षेत्र होते हैं। इन क्षेत्रों में हवा ऊपर उठने के बजाय नीचे की ओर दबती है, जिससे बादल बनने की संभावना कम हो जाती है।
इस कारण:
- आकाश अधिकतर साफ़ रहता है
- वर्षा की संभावना बेहद कम होती है
- तापमान अधिक रहता है
सहारा, अरब और ऑस्ट्रेलिया के बड़े रेगिस्तान इन्ही दबाव वाले क्षेत्रों के आसपास स्थित हैं।
समुद्री धाराओं का प्रभाव

कुछ रेगिस्तान समुद्र के पास होने के बावजूद भी सूखे होते हैं। इसका कारण ठंडी समुद्री धाराएँ हैं। ठंडी धाराएँ हवा को ठंडा कर देती हैं, जिससे वाष्पीकरण (Evaporation) कम हो जाता है और बादल नहीं बन पाते।
ऐसे क्षेत्रों में:
- समुद्र पास होते हुए भी बारिश नहीं होती
- तटीय क्षेत्र सूखे बने रहते हैं
- रेगिस्तान विकसित हो जाते हैं
अटाकामा और नामीब रेगिस्तान इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
तापमान का अत्यधिक उतार-चढ़ाव
रेगिस्तानों में दिन और रात के तापमान में बहुत अंतर होता है। दिन में तेज़ गर्मी और रात में अचानक ठंड चट्टानों और मिट्टी को प्रभावित करती है। इस प्रक्रिया को भौतिक अपक्षय (Physical weathering) कहा जाता है।
लगातार तापमान परिवर्तन से:
- चट्टानें टूटकर रेत में बदल जाती हैं
- मिट्टी की संरचना बिगड़ जाती है
- भूमि उपजाऊ नहीं रह पाती
यह स्थिति रेगिस्तान बनने की प्रक्रिया को और तेज कर देती है।
तेज़ हवाएँ और मिट्टी का कटाव
रेगिस्तानी क्षेत्रों में तेज़ हवाएँ चलती हैं, जो मिट्टी के ऊपरी उपजाऊ हिस्से को उड़ा ले जाती हैं। जब यह उपजाऊ परत हट जाती है, तो नीचे की बंजर परत सामने आ जाती है।
इसका परिणाम यह होता है कि:
- खेती योग्य मिट्टी नष्ट हो जाती है
- रेत के टीले बनने लगते हैं
- भूमि पर वनस्पति उगना कठिन हो जाता है
धीरे-धीरे पूरा क्षेत्र रेगिस्तान में बदल जाता है।
मानव गतिविधियाँ और मरुस्थलीकरण
आज के समय में रेगिस्तान बनने की प्रक्रिया में मानव की भूमिका बहुत बढ़ गई है। इसे मरुस्थलीकरण कहा जाता है। कई ऐसे क्षेत्र, जो पहले उपजाऊ थे, अब मानव लापरवाही के कारण सूखते जा रहे हैं। वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, गलत खेती और जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन इस समस्या को बढ़ा रहे हैं। जब पेड़ काट दिए जाते हैं, तो मिट्टी को बाँधने वाली जड़ें खत्म हो जाती हैं और भूमि विनाश की ओर बढ़ने लगती है।
रेगिस्तानों के प्रकार

रेगिस्तान अलग-अलग प्रकार के होते हैं और सभी एक जैसे नहीं होते।
जैसे कि:
- गर्म रेगिस्तान, जहाँ तापमान बहुत अधिक होता है
- ठंडे रेगिस्तान, जहाँ बर्फ और ठंड प्रमुख होती है
- तटीय रेगिस्तान, जो समुद्र के पास होते हैं
- अर्ध-रेगिस्तानी क्षेत्र, जहाँ कुछ मात्रा में वनस्पति पाई जाती है
रेगिस्तान और मानव जीवन
रेगिस्तानी जीवन कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। दुनिया के कई हिस्सों में लोग रेगिस्तान के अनुसार अपने जीवन को ढाल चुके हैं। सीमित पानी, विशेष प्रकार की खेती, पशुपालन और पारंपरिक ज्ञान के सहारे लोग वहाँ जीवन यापन कर रहे हैं। हालाँकि, बढ़ता मरुस्थलीकरण भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अगर इसे समय रहते नहीं रोका गया, तो खाद्य सुरक्षा और जल संकट और गहरा सकता है।
निष्कर्ष
रेगिस्तान बनने की प्रक्रिया प्राकृतिक कारणों से शुरू होती है, लेकिन मानव गतिविधियाँ इसे कई गुना तेज कर देती हैं। जब हम समझते हैं कि रेगिस्तान कैसे बनते है, तो यह साफ़ होता है कि कम वर्षा, भौगोलिक स्थिति, पर्वतों की भूमिका, समुद्री धाराएँ और तापमान जैसे प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ वनों की कटाई और इंसानों की लापरवाही भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। अगर हम समय रहते जल संरक्षण, वनीकरण और संतुलित विकास पर ध्यान दें, तो मरुस्थलीकरण को काफी हद तक रोका जा सकता है। प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर ही हम अपनी भूमि और भविष्य दोनों को सुरक्षित रख सकते हैं।
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