बारिश का नाम सुनते ही हमारे मन में ताज़गी और हरियाली की छवि उभरती है। लेकिन जब यही बारिश हद से ज़्यादा होने लगती है, तो वह बाढ़ और तबाही का रूप लेने लगती है। भारी बारिश और बाढ़ के कारण हाल के वर्षों में भारत समेत पूरी दुनिया में यह स्थिति बार-बार देखने को मिल रही है। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या यह सब सिर्फ प्राकृतिक घटना है या इसके पीछे इंसान की गतिविधियों का भी योगदान है? विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग ही इस असामान्य और खतरनाक बारिश-बाढ के पैटर्न के पीछे सबसे बड़ी वजह हैं।
जलवायु परिवर्तन और बदलते मौसम पैटर्न

पिछले 100 सालों में धरती का औसत तापमान लगभग 1.1°C बढ़ चुका है। यह सुनने में भले ही छोटा लगे, लेकिन इसके असर बेहद गहरे हैं।
- मानसून का समय अब स्थिर नहीं रहा। कभी जून में समय से पहले बारिश, तो कभी जुलाई-अगस्त में लंबे सूखे के बाद अचानक भारी बरसात।
- अत्यधिक गर्मी से वातावरण में नमी अधिक हो जाती है, और जब यह नमी एक साथ गिरती है तो cloudburst और flash flood जैसी घटनाएँ होती हैं।
- वैज्ञानिक कहते हैं कि भारत में अब extreme rainfall events की संख्या पिछले 50 सालों में लगभग तीन गुना हो चुकी है।
ग्लेशियर का पिघलना और नदियों का उफान
हिमालय को एशिया का वाटर टॉवर कहा जाता है क्योंकि यहाँ से गंगा, ब्रह्मपुत्र, यमुना और सिंधु जैसी नदियाँ निकलती हैं।
लेकिन:
- तापमान बढ़ने से हिमनद (glaciers) तेज़ी से पिघल रहे हैं।
- ग्लेशियर पिघलने से गर्मियों में नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है, जिससे उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल जैसे इलाकों में बाढ़ का खतरा रहता है।
- भविष्य में जब यह ग्लेशियर पूरी तरह पिघल जाएंगे, तो नदियों का प्रवाह घटेगा और जल संकट भी बढ़ेगा।
उदाहरण:
- 2013 की केदारनाथ आपदा – अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन।
- 2021 उत्तराखंड ग्लेशियर टूटना – ऋषिगंगा प्रोजेक्ट बह गया और हजारों लोग प्रभावित हुए।
वनों की कटाई और शहरीकरण की भूमिका

प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए पेड़-पौधे बेहद ज़रूरी हैं।
लेकिन:
- लगातार जंगलों की कटाई और अत्यधिक शहरीकरण ने जमीन की पानी सोखने की क्षमता घटा दी है।
- पहले बारिश का पानी जंगल और मिट्टी में समा जाता था, लेकिन अब वह कंक्रीट और पक्की सड़कों पर बहकर नालों को भर देता है।
- यही कारण है कि मुंबई, दिल्ली, चेन्नई जैसे महानगरों में हर साल “urban flood” देखने को मिलता है।
दुनिया भर में बाढ़ की घटनाएं
भारत ही नहीं, पूरी दुनिया इस संकट से जूझ रही है:
- पाकिस्तान (2022) – देश का लगभग 33% हिस्सा बाढ़ में डूब गया, करोड़ों लोग प्रभावित हुए।
- जर्मनी और बेल्जियम (2021) – यूरोप में बाढ़ से हजारों करोड़ का नुकसान।
- अमेरिका – हर साल हरिकेन और फ्लड का खतरा बढ़ता जा रहा है।
- चीन – हेनान प्रांत (2021) में सिर्फ तीन दिनों में साल भर की बारिश हुई।
यह सभी घटनाएँ बताती हैं कि जलवायु परिवर्तन अब किसी एक देश का नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए खतरा है।
भारत में हाल की बाढ़ के उदाहरण

- असम और बिहार – हर साल लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित होते हैं।
- केरल (2018) – 100 साल की सबसे भीषण बाढ़, 400 से ज़्यादा मौतें।
- महाराष्ट्र और कर्नाटक (2021) – नदियों के उफान से गांव बह गए।
इन घटनाओं से साफ है कि भारत की भौगोलिक स्थिति जलवायु परिवर्तन के असर को और भी गंभीर बना रही है।
बाढ़ और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
- मानवीय संकट – जान-माल का नुकसान, लाखों लोग विस्थापित।
- कृषि पर असर – खेत डूब जाते हैं, फसलें नष्ट हो जाती हैं।
- आर्थिक नुकसान – अरबों रुपए की संपत्ति और इंफ्रास्ट्रक्चर नष्ट।
- स्वास्थ्य समस्याएँ – पानी से फैलने वाली बीमारियाँ (डेंगू, मलेरिया, हैजा)।
- पर्यावरणीय नुकसान – मिट्टी का कटाव, वन्यजीवों का विस्थापन।
समाधान और हमारी ज़िम्मेदारी

1. व्यक्तिगत स्तर पर
- पेड़ लगाना और पौधों की देखभाल।
- बिजली–पानी की बचत।
- प्लास्टिक का कम इस्तेमाल।
- सार्वजनिक परिवहन या साइकिल का उपयोग।
2. सामुदायिक स्तर पर
- वर्षा जल संचयन (Rainwater harvesting)।
- नालों और ड्रेनेज की नियमित सफाई।
- स्थानीय स्तर पर वृक्षारोपण अभियान।
3. सरकारी और वैश्विक स्तर पर
- पेड़ों कि कटाई पर रोक लगाना।
- नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा (सौर, पवन, जल)।
- आपदा प्रबंधन की मजबूत व्यवस्था।
- जलवायु परिवर्तन से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय समझौते (जैसे पेरिस समझौता) का पालन।
{Source}https://en.wikipedia.org/wiki/Climate_change
निष्कर्ष
भारी बारिश और बाढ़ को केवल “प्राकृतिक आपदा” मानना सही नहीं होगा। यह दरअसल प्रकृति का हमें चेतावनी देने का तरीका है कि इंसानी लालच और लापरवाह विकास ने पर्यावरण को असंतुलित कर दिया है। यदि हमने अभी से जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से नहीं लिया, तो भविष्य में आने वाली पीढ़ियों के लिए जीना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए ज़रूरी है कि हम सभी – व्यक्ति, समाज और सरकार – मिलकर ऐसे कदम उठाएँ जिससे प्रकृति का संतुलन दोबारा स्थापित हो सके। तभी हम आने वाले समय में सुरक्षित और संतुलित जीवन जी पाएँगे।
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