IIT रुड़की हिमालयी जलवायु शोध: हिमालयी मौसम प्रणालियों में उभरते जलवायु संकेतों का खुलासा

IIT रुड़की हिमालयी जलवायु शोध 2026 के रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने हिमालयी क्षेत्र की मौसम प्रणालियों पर एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित किया है। इस शोध में यह बात सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के ऊपर बनने वाले वेदर पैटर्न में अब स्पष्ट और चिंताजनक “क्लाइमेट सिग्नल्स” दिखाई देने लगे हैं, जो आने वाले समय में भीषण प्राकृतिक आपदाओं का कारण बन सकते हैं।

पश्चिमी विक्षोभ के व्यवहार में बदलाव

शोध के अनुसार, सर्दियों के दौरान उत्तर भारत में बारिश और बर्फबारी लाने वाले पश्चिमी विक्षोभ अब अपनी सामान्य लय खो रहे हैं। अध्ययन में पाया गया कि ये विक्षोभ अब पहले की तुलना में अधिक तीव्र और अनियंत्रित हो गए हैं। इसके परिणामस्वरूप, हिमालयी राज्यों में ‘क्लाउडबर्स्ट’ (बादल फटना) और अचानक आने वाली बाढ़ (Flash Floods) की घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि विक्षोभ के इस बदलते व्यवहार से सर्दियों की बर्फबारी का चक्र भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

एलिवेशन डिपेंडेंट वार्मिंग का प्रभाव

आईआईटी (IIT) रुड़की के वैज्ञानिकों ने डेटा विश्लेषण के आधार पर बताया कि हिमालय के ऊंचे शिखरों पर तापमान बढ़ने की गति मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक तेज है। इसे ‘एलिवेशन डिपेंडेंट वार्मिंग’ कहा जाता है। इस तापीय बदलाव के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की दर बढ़ गई है और हिमालयी इकोसिस्टम में ‘थर्मल शिफ्ट’ देखा जा रहा है, जिससे स्थानीय वनस्पतियों और वन्यजीवों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है।

वन्यजीवों और स्थानीय इकोसिस्टम पर प्रभाव

IIT रुड़की हिमालयी जलवायु शोध में एक और चिंताजनक पहलू ‘थर्मल शिफ्ट’ (तापमान में बदलाव) का है, जो सीधे तौर पर हिमालय की अनूठी जैव विविधता को प्रभावित कर रहा है। शोधकर्ताओं के अनुसार, मौसम प्रणालियों में आ रहे इन बदलावों के कारण ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले वन्यजीवों, जैसे कि हिम तेंदुआ और कस्तूरी मृग, के प्राकृतिक आवास सिकुड़ रहे हैं। तापमान बढ़ने से निचली पहाड़ियों की वनस्पतियां अब अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसक रही हैं, जिसे वैज्ञानिक शब्दावली में ‘लाइन शिफ्ट’ कहा जाता है।

यह बदलाव न केवल जानवरों के भोजन चक्र को प्रभावित कर रहा है, बल्कि मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) की घटनाओं को भी बढ़ा सकता है। चूंकि मौसम का मिजाज अब पहले जैसा स्थिर नहीं रहा, इसलिए कई प्रवासी पक्षियों के आगमन और प्रजनन चक्र में भी विसंगतियां देखी जा रही हैं। इकोसिस्टम में आ रहा यह असंतुलन हिमालयी क्षेत्र की प्राकृतिक स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है।

जल सुरक्षा और कृषि पर संकट

अध्ययन में यह भी पता चला है कि मौसम प्रणालियों में आ रहे ये बदलाव केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेंगे। हिमालय से निकलने वाली प्रमुख नदियां – गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र – पूरी तरह से बर्फबारी और मानसूनी वर्षा के संतुलन पर निर्भर हैं। मौसम प्रणाली में इस असंतुलन से:

  • नदियों के जल स्तर में अस्तिरता आएगी।
  • तराई क्षेत्रों और मैदानी इलाकों की कृषि व्यवस्था प्रभावित होगी।
  • पीने के पानी की उपलब्धता पर लंबे समय तक संकट उत्पन्न हो सकता है।

डेटा और कार्यप्रणाली

यह शोध पिछले कई दशकों के उपग्रह डेटा (Satellite Data) और ग्राउंड-आधारित मौसम केंद्रों से प्राप्त जानकारी के व्यापक विश्लेषण पर आधारित है। शोधकर्ताओं ने आधुनिक जलवायु मॉडलों का उपयोग करते हुए यह स्पष्ट किया है कि मानवीय गतिविधियों और वैश्विक तापमान में वृद्धि ने हिमालय के वायुमंडलीय दबाव (Atmospheric Pressure) को बदल दिया है, जिससे भविष्य में चरम मौसम की घटनाएं और बढ़ेगी।


इन्हें भी पढ़ें:

Leave a Comment