नागालैंड के वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। पूर्वोत्तर भारत, जो अपने जैव-विविधता के लिए जाना जाता है, वहाॅं के स्थानीय समुदायों ने अब लुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा के लिए कमान संभाल ली है। हाल ही में, संगतम नागा समुदाय की सर्वोच्च संस्था, यूनाइटेड संगतम लिखम पुमजी (USLP) ने अपने अधिकार क्षेत्र में पैंगोलिन के शिकार और व्यापार पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का एक क्रान्तिकारी प्रस्ताव पारित किया है। यह निर्णय न केवल नागालैंड के लिए, बल्कि वैश्विक वन्यजीव संरक्षण प्रयासों के लिए भी एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
पैंगोलिन: दुनिया का सबसे अधिक तस्करी होने वाला जीव
पैंगोलिन एक शर्मीला और रात में सक्रिय रहने वाला स्तनधारी प्राणी है, जिसके शरीर पर केराटिन से बनी सख्त परत (Scales) होती है। ये जीव पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) में ‘प्राकृतिक इंजीनियर’ की भूमिका निभाते हैं, क्योंकि ये चींटियों और दीमकों की आबादी को नियंत्रित रखते हैं। दुर्भाग्यवश, पैंगोलिन दुनिया के सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाले वन्यजीवों में से एक हैं। इनके मांस को विलासिता का प्रतीक माना जाता है और इनके स्केल्स का उपयोग पारंपरिक चीनी दवाओं में किया जाता है, हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। भारत में ‘इंडियन पैंगोलिन’ और ‘चाइनीज पैंगोलिन’ दोनों प्रजातियां पाई जाती हैं, और दोनों ही विलुप्ति के खतरे से जूझ रही हैं।
सामुदायिक नेतृत्व में संरक्षण की शक्ति
नागालैंड की एक विशिष्ट भौगोलिक और प्रशासनिक व्यवस्था है, जहाँ अधिकांश वन भूमि का स्वामित्व सरकार के पास न होकर स्थानीय समुदायों और जनजातीय परिषदों के पास है। ऐसे में, जब तक स्थानीय लोग स्वयं आगे नहीं आते, सरकारी कानूनों का जमीन पर लागू होना चुनौतीपूर्ण होता है। USLP द्वारा लिया गया यह निर्णय ‘बॉटम-अप अप्रोच’ (नीचे से ऊपर की ओर) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
संगतम नागा समुदाय ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि वे अपनी प्राकृतिक विरासत को बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इस प्रतिबंध के तहत, समुदाय के भीतर पैंगोलिन को मारना, उसका मांस खाना या उसके अंगों का व्यापार करना अब सामाजिक और सामुदायिक रूप से दंडनीय अपराध माना जाएगा। यह स्वैच्छिक प्रतिबंध भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों को स्थानीय स्तर पर मजबूती प्रदान करता है।
संरक्षण परियोजनाओं का सहयोग
इस महत्वपूर्ण निर्णय के पीछे वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI) के निरंतर प्रयासों की भी बड़ी भूमिका है। WTI द्वारा संचालित ‘पैंगोलिन ट्रैफिकिंग प्रोजेक्ट’, जिसे ‘पैंगोलिन क्राइसिस फंड’ (PCF) से सहायता प्राप्त है, पिछले काफी समय से नागालैंड के विभिन्न समुदायों के साथ मिलकर काम कर रहा है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य स्थानीय लोगों में जागरूकता पैदा करना और उन्हें वन्यजीवों के रक्षक के रूप में प्रशिक्षित करना है।
संगतम नागा समुदाय के इस प्रस्ताव को पारित कराने के लिए कई दौर की बैठकें और जागरूकता अभियान चलाए गए। इसमें पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक संरक्षण तकनीकों के साथ जोड़ा गया, जिससे स्थानीय लोगों को यह समझ आया कि पैंगोलिन उनके जंगलों के स्वास्थ्य के लिए क्यों आवश्यक है।
इकोसिस्टम और भविष्य पर प्रभाव
नागालैंड के जंगलों में पैंगोलिन की उपस्थिति मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद करती है। वे अपने बिल खोदते समय मिट्टी को उलटते-पलटते हैं, जिससे ऑक्सीजन का संचार बेहतर होता है। यदि पैंगोलिन विलुप्त हो जाते हैं, तो चींटियों और दीमकों की संख्या अनियंत्रित हो सकती है, जिसका सीधा असर वनस्पति और कृषि पर पड़ेगा।
संगतम समुदाय का यह कदम अन्य जनजातीय समूहों के लिए भी एक रोल मॉडल की तरह काम करेगा। उत्तर-पूर्वी राज्यों में जहाँ अक्सर शिकार एक पारंपरिक संस्कृति का हिस्सा रहा है, वहां इस तरह का बदलाव एक “सांस्कृतिक परिवर्तन” (Cultural Shift) की ओर इशारा करता है। यह दिखाता है कि कैसे पारंपरिक शासन प्रणालियाँ (Traditional Governance) आधुनिक पर्यावरण संकटों का समाधान खोजने में सक्षम हैं।
इस निर्णय का प्रभाव केवल पैंगोलिन तक सीमित नहीं रहेगा। जब एक समुदाय किसी एक प्रजाति की रक्षा की जिम्मेदारी लेता है, तो अनजाने में वह पूरे वन क्षेत्र और उसमें रहने वाले अन्य जीवों के लिए भी एक सुरक्षित वातावरण तैयार करता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी, यह पहल भारत की उस छवि को मजबूत करती है जहाँ विकास और संरक्षण एक साथ चल सकते हैं।
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