भारत अपने समृद्ध जैव-विविधता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है, लेकिन आज के समय में कई सारे वन्यजीव संकट में है। बाघ, गैंडा और हिम तेंदुआ जैसी प्रजातियाॅं आवास की कमी, अवैध शिकार और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं का सामना कर रही है। भारत के संकटग्रस्त वन्यजीव के संरक्षण के लिए सरकार ने Project Tiger, Project Elephant और अनेक नेशनल पार्कों की स्थापना की है।
भारत के संकटग्रस्त वन्यजीव
उदाहरण के लिए, बंगाल टाईगर (Bengal Tiger) भारत में पाए जाने वाले बाघों का प्रमुख रूप है। बाघ की यह प्रजाति कई दशकों से खतरें में है क्योंकि इसका आवास कम होता जा रहा है और शिकार एवं मानव-वन्यजीव टकराव बढ़ रहा है। इसके अलावा, भारत में IUCN द्वारा गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजातियों की एक सूची जारी की गई है – वर्ष 2022 तक देश में 73 ऐसी प्रजातियां पाई गई थी जो गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्रेणी में है।
मुख्य खतरें:
- आवास-नष्ट होना – जंगल काटना, भूमि का कृषि या वाणिज्यिक (Commercial) उपयोग में बदलना।
- मानव-वन्यजीव टकराव – जंगल व आवास से बाहर निकले जानवर धीरे-धीरे मानव-आवासों के करीब आते हैं, जिससे दुर्घटनाएँ और संघर्ष होते हैं।
- अवैध शिकार / तस्करी – सींग, खाल या मांस के लिए वन्यजीवों का शिकार।
- जलवायु परिवर्तन एवं आवास का विखंडन – पर्वतीय और तटीय क्षेत्रों में बदलाव होने से कई प्रजातियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है
प्रमुख संकटग्रस्त प्रजातियों पर एक नजर
- बंगाल टाईगर (Bengal Tiger): भारत में बाघ की इस प्रजाति को संरक्षण कार्यक्रम के तहत रखा गया है।
- स्नो लेपर्ड (Snow Leopard): तेंदुए की यह प्रजाति आम तौर पर भारत के हिमालयन क्षेत्रों में पाए जाते हैं। प्राकृतिक आवास सीमित और बहुत उॅंचे इलाकों में होने के वजह से इसे विशेष रक्षा की जरूरत है।
- एक सींग वाला गैंडा (Greater One-horned Rhinoceros): पूर्वोत्तर भारत के दलदली इलाकों का निवासी, इसे सींग की तस्करी और मानव हस्तक्षेप जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है
संरक्षण-प्रयास: सरकार और समाज की भूमिका
पिछले कई सालों में भारत ने वन्यजीव संरक्षण के लिए अनेक कानून और व्यवस्थाएं बनाए हैं:
- Wildlife Protection Act, 1972: यह कानून वन्यजीव और उनके आवासों की रक्षा के लिए बनाया गया है। Source: {Wikipedia}
- विशेष परियोजनाएं जैसे Project Tiger, Project Elephant, Project Snow Leopard इत्यादि – इन सभी योजनाओं का उद्देश्य है कुछ विशेष प्रजातियों का बचाव करना।
- सुरक्षित क्षेत्रों की स्थापना: नेशनल पार्क, वाइल्ड-लाइफ सेंचुरी, बायोस्फीयर रिजर्व जैसे जगहों की स्थापना ताकि वन्यजीवों का सुरक्षित आवास बना रहे।
- आवास-संपर्क (Corridor) का निर्माण: जंगलों के बीच संवादित मार्ग बनाना ताकि जानवर लंबी दूरी तय कर सके, एक ही जगहे पर घिरे न रहे।
चुनौतियाॅं अभी भी बरकरार
संरक्षण के इन प्रयासों के बावजूद कई चुनौतियां अभी भी बनी हुई है:
- विकास-प्रयोजन और सड़क-रेल नेटवर्क की वजह से आवास विखंडित हो रहे हैं, जंगल छोटे-छोटे टुकड़ों में बँट चले हैं।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष-मामले बढ़ गये हैं। उदाहरण के लिए, हाथियों, बाघों आदि के जंगल से निकलने के बाद दुर्घटनाओं की खबरें सामने आती हैं।
- संसाधनों एवं निगरानी का अभाव। संरक्षण-प्रयोजन में पर्याप्त फंड, मानव-साधन, तकनीक की कमी कही-कही दिखती है।
आगे क्या किया जा सकता है?
इस वन्यजीव संरक्षण में हम सभी की भागीदारी आवश्यक है – सरकार, वन विभाग, स्थानीय जन-समुदाय और हम आम लोग।
कुछ सुझाव:
- भारत के संकटग्रस्त वन्यजीव को बचाने के लिए स्थानीय वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रमों में भाग लें, स्वयं के स्तर पर जागरूकता फैलाएँ।
- जंगलों और नेशनल पार्कों में यात्रा करते समय जानवरों को परेशान न करें।
- स्थानीय समुदायों का सहयोग करें – जंगलों के आसपास रहने वाले लोगों को संरक्षण-प्रक्रिया में शामिल करें।
- विकास-परियोजनाओं में पर्यावरण-प्रभाव का ख्याल रखें, जंगलों का कटाव कम करें, जानवरों के लिए चौड़ाई वाले रास्ते बनायें।
निष्कर्ष
भारत के संकटग्रस्त वन्यजीव केवल कुछ जानवर नहीं, वे हमारी जैव विविधता, इकोलॉजिकल संतुलन, और आने वाली पीढ़ियों के लिए सूरक्षा की नींव हैं। अगर हम आज समय रहते संरक्षण-प्रयास को बढ़ायें, तो ये प्रजातियाँ सुरक्षित रह सकती हैं। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन्हें विलुप्ति-की कगार से वापस लायें। आइए, मिलकर यह संकल्प लें कि हम वन्यजीवों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभायेंगे – क्योंकि इनकी रक्षा में हमारी भी रक्षा निहित है।
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