भारत में प्रोजेक्ट चीता अपनी शुरुआत के साढ़े तीन साल पूरे करने की ओर है और फरवरी 2026 में यह एक बेहद रोमांचक मोड़ पर खड़ा है। 1952 में देश से विलुप्त घोषित किए गए इस शिकारी जीव को वापस बसाने की भारत की महत्वाकांक्षी योजना अब केवल कूनो नेशनल पार्क तक सीमित नहीं रही, बल्कि नए इलाकों और नई पीढ़ियों तक फैल चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह परियोजना अब केवल एक प्रयोग नहीं बल्कि “विलुप्ति को उलटने” की दिशा में दुनिया का सबसे बड़ा वन्यजीव प्रयास बन चुकी है। आने वाले कुछ सप्ताह इस लिहाज से और भी महत्वपूर्ण होने वाले हैं, क्योंकि भारत की धरती पर चीतों की तीसरी पीढ़ी के स्वागत की तैयारियां जोर-शोर से चल रही है।
कुनबे में इज़ाफा: 30 के पार पहुंची संख्या
फरवरी 2026 की ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार, भारत में चीतों की कुल संख्या अब 30 के पार पहुँच चुकी है। इसमें सबसे सुखद पहलू यह है कि वर्तमान आबादी में 16 से अधिक चीते भारत की धरती पर पैदा हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रोजेक्ट की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है क्योंकि विदेशी चीतों ने न केवल भारत के वातावरण को अपनाया है, बल्कि यहाँ सफलतापूर्वक प्रजनन भी किया है। ‘ज्वाला’ और ‘आशा’ नामक मादा चीतों ने कई बार शावकों को जन्म देकर इस प्रोजेक्ट को नई उम्मीद दी है।
28 फरवरी: बोत्सवाना से आएगा तीसरा जत्था
प्रोजेक्ट चीता के अगले चरण की सबसे बड़ी खबर यह है कि 28 फरवरी 2026 को बोत्सवाना से 8 और चीते भारत लाए जा रहे हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने हाल ही में दिल्ली में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात के बाद इसकी आधिकारिक पुष्टि की है। इस नए जत्थे में 2 नर और 6 मादा चीते शामिल होंगे। इन चीतों को सबसे पहले कूनो नेशनल पार्क में ‘क्वारंटाइन’ में रखा जाएगा, जिसके बाद उन्हें धीरे-धीरे खुले जंगल या अन्य अभयारण्यों में छोड़ा जाएगा।
गांधी सागर अभयारण्य: चीतों का दूसरा घर
अब तक प्रोजेक्ट चीता का पूरा केंद्र कूनो नेशनल पार्क था, लेकिन 2026 की शुरुआत के साथ ही गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य (मंदसौर, मध्य प्रदेश) आधिकारिक तौर पर चीतों का दूसरा घर बन गया है। कूनो में जगह की कमी और सुरक्षा को देखते हुए, कुछ चीतों को पहले ही गांधी सागर में ट्रांसफर किया जा चुका है। ‘प्रभास’, ‘पावक’ और ‘धीरा’ नामक नर चीतें इस समय गांधी सागर के खुले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक रह रहे हैं। अधिकारियों के मुताबिक, गांधी सागर में एक मादा चीता के गर्भवती होने के संकेत मिले हैं, जिससे 2026 की पहली तिमाही में वहाँ भी ‘इंडिया बोर्न’ शावकों के आने की उम्मीद है।
चुनौतियां और सीख
प्रोजेक्ट की राह हमेशा आसान नहीं रही है। पिछले तीन सालों में नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए गए 20 वयस्क चीतों में से 9 की मृत्यु हो चुकी है। हालांकि, वन्यजीव वैज्ञानिकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्थानांतरण में 50% मृत्यु दर की आशंका पहले से ही जताई गई थी। 2026 तक आते-आते, भारतीय विशेषज्ञों ने कई अहम सबक सीखे हैं:
- जलवायु अनुकूलन: चीतों की सर्दियों की खाल (Winter coat) और भारतीय मानसून के बीच सामंजस्य बिठाने के लिए अब विशेष चिकित्सा प्रोटोकॉल अपनाए जा रहे हैं।
- रेडियो कॉलर प्रबंधन: रेडियो कॉलर के नीचे होने वाले संक्रमण (Infections) से बचने के लिए निगरानी और तकनीक में बदलाव किए गए हैं।
- शिकार की उपलब्धता: चीतों के आहार के लिए चीतल और अन्य जानवरों का घनत्व बढ़ाने पर निरंतर काम किया जा रहा है।
इको-टूरिज्म और स्थानीय रोजगार
प्रोजेक्ट चीता केवल वन्यजीव संरक्षण तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसने ‘चीता टूरिज्म’ के माध्यम से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति दी है। कूनो के आसपास ‘चीता मित्र’ पहल के तहत 450 से अधिक स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला है। पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए होमस्टे और गाइड प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार किया जा रहा है, जिससे संरक्षण के साथ-साथ समुदाय का विकास भी सुनिश्चित हो रहा है।
भविष्य की योजना: 2032 तक का लक्ष्य
भारत सरकार का लक्ष्य 2032 तक देश में 60 से 70 चीतों की एक आत्मनिर्भर आबादी स्थापित करना है। इसके लिए आने वाले सालों में राजस्थान के “शाहगढ़ बल्ज” और मध्य प्रदेश के “नौरादेही” जैसे क्षेत्रों को भी तैयार किया जा रहा है। बोत्सवाना से आने वाले नए चीतें इस सपने को हकीकत में बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होंगे।
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