दुनिया भर में पक्षियों की कई प्रजातियां आज मानवीय गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के कारण विलुप्ति के कगार पर खड़ी हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत संकटग्रस्त पक्षी है “बंगाल फ्लोरिकन” (Bengal Florican), जिसे नेपाल में स्थानीय भाषा में “चरस” के नाम से जाना जाता है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के आंकड़ों के अनुसार, पूरे विश्व में इस दुर्लभ पक्षी की आबादी 1,000 से भी कम रह गई है।
लगातार सिकुड़ते घास के मैदानों और कृषि विस्तार के कारण नेपाल में अब इस पक्षी के कुछ दर्जन जोड़े ही बचे हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए, नेपाल सरकार और वन्यजीव संरक्षणकर्ता अब कंबोडिया के सफल ‘कैप्टिव ब्रीडिंग’ (संरक्षित माहौल में प्रजनन) मॉडल को अपनाने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। हालांकि, इस योजना को लेकर विशेषज्ञों की अपनी चिंताएं और चेतावनियां भी हैं।
क्या है बंगाल फ्लोरिकन और क्यों मंडरा रहा है इस पर खतरा?
बंगाल फ्लोरिकन (हाउबारोप्सिस बेंगालेंसिस), जिसे बंगाल बस्टर्ड भी कहा जाता है, मुख्य रूप से अपने अनूठे ‘प्रणय प्रदर्शन’ (Mating Display) के लिए प्रसिद्ध है। प्रजनन के मौसम में नर पक्षी मादा को आकर्षित करने के लिए अपने पंख फड़फड़ाता है और हवा में खुद को इस तरह उछालता है मानो किसी ट्रैम्पोलिन पर कूद रहा हो।
ऐतिहासिक रूप से यह पक्षी उत्तरी भारत से लेकर नेपाल और बांग्लादेश तक फैले विशाल घास के मैदानों में पाया जाता था। दुर्भाग्य से, बांग्लादेश में अब इसे विलुप्त मान लिया गया है। वर्तमान में इसकी एक छोटी आबादी नेपाल और भारत में, जबकि दूसरी उप-जनसंख्या (Sub-population) कंबोडिया और संभवतः वियतनाम में बची है।
नेपाल में इस प्रजाति के पतन के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- घास के मैदानों का विनाश: खेती के लिए बड़े पैमाने पर घास के मैदानों को साफ किया जा रहा है, जो इनका मुख्य प्राकृतिक आवास है।
- कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग: खेतों में जहरीले रसायनों के इस्तेमाल से उन कीड़ों की संख्या कम हो गई है, जिन्हें खाकर यह पक्षी जीवित रहता है।
- इंसानी दखल और शिकार: प्रजनन के मौसम में अवैध शिकार और मनुष्यों की आवाजाही इनके लिए बड़ा खतरा बन गई है।
- गलत समय पर आग लगाना: जंगलों और पार्कों के प्रबंधन के दौरान गलत समय पर लगाई गई आग इनके घोंसलों को नष्ट कर देती है।
नेपाल का ‘कैप्टिव ब्रीडिंग’ प्लान और कंबोडिया की सफलता
नेपाल में हाल ही में हुए 2023 के एक सर्वेक्षण में निराशाजनक आंकड़े सामने आए। देश के पूर्वी हिस्से में स्थित कोशी टप्पू वन्यजीव रिजर्व और उसके आसपास केवल 24 फ्लोरिकन दर्ज किए गए। इसके अलावा शुक्लाफांटा नेशनल पार्क में 5 और चितवन नेशनल पार्क में महज 2 फ्लोरिकन देखे गए। पिछले सर्वेक्षणों की तुलना में यह एक भारी गिरावट है।
इस संकट से निपटने के लिए, 2024 के एक सरकारी प्रस्ताव में चिड़ियाघरों और एवियरी (पक्षिशाला) में इस पक्षी के कृत्रिम प्रजनन यानी ‘कैप्टिव ब्रीडिंग’ (एक्स-सीटू कंजर्वेशन) का सुझाव दिया गया है। नेपाल के लिए यह विचार नया नहीं है; 2008 से 2022 के बीच चितवन राष्ट्रीय उद्यान में लुप्तप्राय सफेद-पूंछ वाले और पतली-चोंच वाले गिद्धों के लिए ऐसा ही एक सफल कार्यक्रम चलाया जा चुका है, जिसमें 18 चूजों को पालकर वापस जंगल में छोड़ा गया था।
नेपाल का यह नया कदम कंबोडिया की टोनले सैप झील के पास चल रहे सफल संरक्षण कार्यक्रम से प्रेरित है। कंबोडिया में गैर-लाभकारी संस्था ‘अंगकोर सेंटर फॉर कंजर्वेशन ऑफ बायोडायवर्सिटी’ (ACCB) ने 2019 में बंगाल फ्लोरिकन के लिए एक एक्स-सीटू कार्यक्रम शुरू किया था।
वहाँ की प्रक्रिया काफी व्यवस्थित है:
- जब घास के मैदानों में अंडे दिखाई देते हैं, तो स्थानीय स्वयंसेवकों की मदद से उन्हें बेहद सावधानी से उठाया जाता है।
- इन अंडों को कृत्रिम इनक्यूबेशन (Artificial Incubation) में रखा जाता है।
- अंडे सेने के बाद चूजों को एक सुरक्षित और नियंत्रित वातावरण में पाला जाता है।
- जब वे आत्मनिर्भर हो जाते हैं, तो उन्हें वापस उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया जाता है। इस तरह प्रजाति की एक सुरक्षित ‘एश्योरेंस कॉलोनी’ तैयार की जाती है।
बर्ड कंजर्वेशन नेपाल (BCN) के कंजर्वेशन मैनेजर अंकित बिलाश जोशी का मानना है कि नेपाल को भी एक्स-सीटू संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन इसके लिए भारी संसाधनों के निवेश की आवश्यकता होगी।
विशेषज्ञों की चेतावनी: क्या बंदी प्रजनन है सही उपाय?
हालांकि कैप्टिव ब्रीडिंग एक आकर्षक अल्पकालिक उपाय लगता है, लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञ इसे लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं। पुराने पक्षी विज्ञानी राजेंद्र सुवाल जैसे जानकारों का स्पष्ट कहना है कि बंदी प्रजनन केवल आबादी बढ़ाने का एक अस्थायी उपाय हो सकता है, यह मजबूत “हैबिटैट प्रोटेक्शन” (आवास संरक्षण) का विकल्प कभी नहीं बन सकता।
बंगाल फ्लोरिकन के मामले में कैप्टिव ब्रीडिंग कई जोखिम लेकर आती है:
- बेहद शर्मीला स्वभाव: यह पक्षी इंसानी दखल के प्रति बेहद संवेदनशील होता है। अंडों को इकट्ठा करना या प्रजनन के लिए वयस्क पक्षियों को पकड़ना उन्हें भारी तनाव में डाल सकता है।
- जान का खतरा: विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक तनाव के कारण ये पक्षी अपना आवास छोड़ सकते हैं या उनकी मृत्यु भी हो सकती है।
- बूढ़ी होती आबादी: नेपाल में मौजूद फ्लोरिकन की आबादी अब बूढ़ी हो रही है, जिससे उनके प्रजनन की क्षमता कम हो गई है। ऐसे में बंदी प्रजनन के लिए स्वस्थ अंडे खोजना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है।
घास के मैदानों का सख्त प्रबंधन है असली जरूरत
संरक्षणवादियों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि अगर हम फ्लोरिकन को हमेशा के लिए बचाना चाहते हैं, तो सबसे पहले उनके प्राकृतिक घर को बचाना होगा। नेशनल पार्कों में घास के मैदानों के प्रबंधन का एक सख्त शेड्यूल होना चाहिए।
अक्सर पार्क के अधिकारी मानसून से ठीक पहले या बाद में निचले इलाकों की घास काटते हैं या वहां आग लगा देते हैं। पहले यह प्रक्रिया फ्लोरिकन के ‘ब्रीडिंग सीजन’ (प्रजनन काल) के बीच में होती थी, जिससे उनके अंडे और घोंसले नष्ट हो जाते थे। हालांकि नए नियमों के तहत अब घास जलाने का काम ब्रीडिंग सीजन शुरू होने से पहले किया जाना चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन नियमों का सख्ती से पालन नहीं होता है।
किसानों के साथ मिलकर नया रास्ता: लेमनग्रास की खेती
साल 2018 में हुए एक सैटेलाइट-टैगिंग अध्ययन ने बंगाल फ्लोरिकन के व्यवहार के बारे में एक चौंकाने वाला खुलासा किया। दशकों तक यह रहस्य था कि प्रजनन के मौसम के बाद ये पक्षी कहाँ गायब हो जाते हैं। अध्ययन से पता चला कि “नॉन-ब्रीडिंग” महीनों में ये पक्षी बाढ़ वाले क्षेत्रों को छोड़कर असुरक्षित कृषि क्षेत्रों और ऊंचे घास के मैदानों में चले जाते हैं।
इस नई जानकारी ने संरक्षण का एक नया रास्ता खोल दिया है। रिसर्चर सूरज बराल के नेतृत्व में नेपाली ऑर्निथोलॉजिकल यूनियन की एक टीम ने एक अनूठी पहल शुरू की है। वे स्थानीय किसानों को खेतों में ‘लेमनग्रास’ (Lemongrass) उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।
लेमनग्रास एक उच्च मूल्य (High-value) वाली व्यावसायिक फसल है जिससे किसानों को अच्छी आमदनी होती है। साथ ही, यह लंबी और घनी फसल बंगाल फ्लोरिकन के लिए एक आदर्श और सुरक्षित “नॉन-ब्रीडिंग हैबिटैट” का काम करती है। यह किसानों और वन्यजीवों के सह-अस्तित्व का एक बेहतरीन उदाहरण बन सकता है।
अनदेखी आबादी की तलाश और नई उम्मीदें
नेपाल में बंगाल फ्लोरिकन की वर्तमान गिनती का तरीका मुख्य रूप से नर पक्षियों के प्रणय प्रदर्शन को देखने पर निर्भर है। नेपाली ऑर्निथोलॉजिकल यूनियन के अध्यक्ष हथन चौधरी का मानना है कि इस तरीके से कई पक्षी गिनती में छूट जाते हैं। उनका सुझाव है कि शोधकर्ताओं को केवल जाने-पहचाने इलाकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन नए और संभावित आवासों की भी गहन खोज करनी चाहिए जहाँ इनकी अनदेखी आबादी छिपी हो सकती है।
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