गगनचुंबी इमारतें, सड़कों पर गाड़ियों का शोर, प्रदूषण और कंक्रीट के जंगल में तब्दील होती राजधानी दिल्ली। एक नज़र में देखने पर लगता है कि यहां प्रकृति और वन्यजीवों के लिए कोई जगह नहीं बची है। लेकिन, अगर आप कभी आसमान की ओर देखें, तो आपको एक अलग ही दुनिया नज़र आएगी – यह दुनिया है ‘काली चीलों’ की।
हाल ही में सामने आई एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, अगर बात करें दिल्ली में काली चील की, तो यहां पूरी दुनिया में इस शिकारी पक्षी की सबसे ज्यादा आबादी मौजूद है। ये चीलें सिर्फ आसमान में मंडराने वाले खूंखार पक्षी नहीं हैं, बल्कि ये दिल्ली के शहरी इकोसिस्टम (Urban Ecosystem) का एक बेहद जरूरी हिस्सा हैं। आइए गहराई से समझते हैं कि कैसे ये पक्षी इंसानों के बीच रहकर शहर को बीमारियों से बचा रहे हैं और इनके अस्तित्व पर अब कौन से नए खतरे मंडरा रहे हैं।
वैज्ञानिक रिसर्च: 15 सालों से चीलों को समझने की कोशिश
1960 के दशक के बाद से दुनिया भर में काली चीलों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन दिल्ली में इन्होंने अपना मजबूत ठिकाना बना रखा है। वैज्ञानिक निशांत कुमार और उनकी टीम पिछले 15 सालों से दिल्ली की काली चीलों पर गहन अध्ययन कर रहे हैं।
इस रिसर्च के दौरान वैज्ञानिक दिल्ली के चिड़ियाघर (Delhi Zoo) और शहर के अन्य 32 ठिकानों पर ऊंचे और पुराने पेड़ों पर बने घोंसलों तक पहुंचते हैं। यह काम इतना आसान नहीं है; टीम के सदस्य कहते हैं, “इन ऊंचे पेड़ों पर चढ़ना चांद पर आदमी भेजने जैसा है।”वैज्ञानिक बेहद सावधानी से चील के चूजों का वजन मापते हैं, उनके पैरों की हड्डी और पंखों की लंबाई नापते हैं और उनके पंजों में एक खास ‘Alpha-numeric Tag’ लगा देते हैं। इस डाटा से यह पता चलता है कि बदलते पर्यावरण और बढ़ते प्रदूषण के बीच इन पक्षियों का विकास किस तरह हो रहा है।
आस्था और परंपरा: जब शिकारी पक्षी बन जाते हैं दोस्त
काली चीलों और दिल्ली वालों का रिश्ता सिर्फ वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक भी है। पुरानी दिल्ली में 1658 में बनी ऐतिहासिक ईदगाह मस्जिद के पास एक अद्भुत नजारा रोज देखने को मिलता है।
यहां स्थानीय लोग और मुस्लिम समुदाय के सदस्य सदियों पुरानी एक रिवायत का पालन करते हुए चीलों को कच्चा मांस खिलाते हैं। जब लोग मांस के टुकड़े हवा में उछालते हैं, तो आसमान से सैकड़ों चीलें एक साथ गोता लगाते हुए उन्हें लपक लेती हैं। स्थानीय निवासी मोहम्मद हनीफ जैसे लोग मानते हैं कि भूखे पक्षियों को भोजन कराने से दुआएं मिलती हैं और जीवन की परेशानियां दूर होती हैं। यह आस्था का ही परिणाम है कि चीलों के हमले के जोखिम के बावजूद, दिल्ली के लोग इनके प्रति बेहद दयालु और संवेदनशील हैं।
शहर के प्राकृतिक ‘सफाईकर्मी’
काली चीलों का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण रोल दिल्ली के लैंडफिल साइट्स (कचरे के पहाड़ों) पर देखने को मिलता है। एशिया का सबसे बड़ा लैंडफिल, जो करीब 70 एकड़ में फैला है और जिसकी ऊंचाई 65 मीटर तक पहुंच चुकी है, इन चीलों का मुख्य भोजन का स्रोत है। यहां हर दिन क्षमता से अधिक 3000 टन कचरा गिरता है।
इस डंपिंग यार्ड के ठीक बगल में एशिया का सबसे बड़ा चिकन और अंडा बाजार, फलों-सब्जियों की मंडी और एक बड़ी डेयरी है। खराब शहरी प्लानिंग के कारण यह जगह इंसानों के लिए तो नरक बन गई है, लेकिन चीलों के लिए यह एक वरदान है।
- बीमारियों पर लगाम: एक चील रोजाना लगभग 200 ग्राम मांस खाती है। ये पक्षी कचरे में पड़े सड़े-गले मांस को खाकर उसे खत्म करते हैं। अगर ये चीलें ऐसा न करें, तो यह सड़ा हुआ मांस भयानक महामारियों का कारण बन सकता है।
- मीथेन गैस में कमी: जैविक कचरे के सड़ने से निकलने वाली मीथेन (Methane) गैस ग्लोबल वॉर्मिंग का एक बड़ा कारण है। चीलें इस कचरे को खाकर पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कुछ हद तक कम करती हैं।
- प्रवासी पक्षियों का आना: सर्दियों के मौसम में यहां मध्य एशिया और दक्षिणी साइबेरिया से ‘ब्लैक-इयर्ड काइट’ (Black-eared Kite) प्रजाति की चीलें भी आती हैं, जिससे यहां इनकी संख्या हजारों में पहुंच जाती है।
चीलों के अस्तित्व पर मंडराते आधुनिक खतरे
भोजन की उपलब्धता के बावजूद, दिल्ली में काली चील का जीवन संकटों से घिरता जा रहा है:
- पेड़ों की अंधाधुंध कटाई: चीलों को अपने बड़े घोंसले बनाने के लिए पुराने और विशाल पेड़ों की आवश्यकता होती है। दिल्ली के विकास और निर्माण कार्यों के चलते बड़ी संख्या में पुराने पेड़ काटे जा रहे हैं, जिससे इनका प्राकृतिक आवास छिन रहा है।
- जलवायु परिवर्तन: यूरोप की तुलना में दिल्ली में चीलों का प्रजनन काल (Breeding Season) 4 महीने तक चलता है। लेकिन अब अत्यधिक गर्मी, लू (Heatwave) और बेमौसम भारी बारिश जैसी प्रचंड मौसमी घटनाओं के कारण इनका प्रजनन सीजन छोटा हो रहा है और चूजों की जान पर खतरा बढ़ रहा है।
काली चीलें अक्सर हमें डरावनी या आक्रामक लग सकती हैं, लेकिन वास्तव में ये हमारे शहर की साइलेंट रक्षक हैं। ये बेहतरीन माता-पिता हैं और हमारे वो दोस्ताना पड़ोसी हैं जो बिना कोई वेतन लिए दिल्ली की सफाई में दिन-रात जुटे हैं। अगर हम एक स्वस्थ और स्वच्छ शहर चाहते हैं, तो हमें अर्बन प्लानिंग में इन प्राकृतिक सफाईकर्मियों के आवास और सुरक्षा का भी ध्यान रखना होगा।
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