गुजरात का सौराष्ट्र क्षेत्र पूरी दुनिया में एशियाई शेर का इकलौता घर है। हाल ही में वन्यजीव संरक्षण को लेकर एक बहुत ही उत्साहजनक, लेकिन साथ ही सोचने पर मजबूर कर देने वाली रिपोर्ट सामने आई है। ‘ग्लोबल इकोलॉजी एंड कंजर्वेशन मैगज़ीन’ में प्रकाशित एक नए सर्वे के अनुसार, गुजरात में शेरों की आबादी में शानदार इजाफा हुआ है। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अब ये शेर गिर नेशनल पार्क की सीमाओं को लांघ कर इंसानी बस्तियों वाले नए इलाकों में अपना ठिकाना बना रहे हैं। यह स्थिति वन्यजीव प्रेमियों के लिए तो सुखद है, लेकिन प्रशासन के सामने सह-अस्तित्व और संरक्षण की एक नई चुनौती पेश कर रही है।
शेरों की आबादी और भौगोलिक दायरे में शानदार वृद्धि
साल 2020 से 2025 के बीच हुए सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि एशियाई शेरों की कुल आबादी 674 से बढ़कर 891 के पार पहुँच गई है। दिलचस्प तथ्य यह है कि इन करीब 900 शेरों में से आधे से भी कम (महज 394) शेर ही गिर वन्यजीव अभयारण्य और उसके आसपास के मुख्य संरक्षित क्षेत्र में मौजूद हैं। बाकी के शेर अब मुख्य जंगलों से निकलकर सौराष्ट्र के अन्य हिस्सों में फैल चुके हैं।
आबादी बढ़ने के साथ ही शेरों के रहने का भौगोलिक दायरा भी तेजी से बढ़ा है। जहां साल 2020 में यह दायरा 30,000 वर्ग किलोमीटर था, वहीं 2025 में यह 16 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 35,000 वर्ग किलोमीटर हो गया है। गुजरात वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि यह विस्तार एक सकारात्मक संकेत है और शेर अब अपने उन प्राकृतिक आवासों पर वापस कब्ज़ा कर रहे हैं, जो कभी उनका घर हुआ करते थे।
नए ठिकानों की ओर शेरों का रुख
संरक्षण के सख्त नियमों, शिकार (जैसे नीलगाय और जंगली सूअर) की पर्याप्त उपलब्धता और घनी वनस्पतियों के कारण अमरेली और भावनगर जैसे इलाकों में शेरों की अच्छी खासी आबादी देखी जा रही है। अमरेली का सावरकुंडला-लिलिया क्षेत्र वर्तमान में गिर के बाहर शेरों का एक बड़ा केंद्र बन गया है।
सबसे बड़ी सफलता बरदा वन्यजीव अभयारण्य में देखने को मिली है। इस अभयारण्य में आखिरी बार 1879 में शेरों को देखा गया था, लेकिन अब यहां 17 शेरों का एक नया कुनबा फिर से स्थापित हो चुका है। इसके अलावा, सौराष्ट्र के तटीय इलाकों और जेतपुर एवं बाबरा-जसदान जैसे नए क्षेत्रों में भी पहली बार शेरों की नई पीढ़ियां दर्ज की गई हैं।
बस्तियों के करीब पहुंचने से मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा
हालांकि शेरों का यह फैलाव इकोलॉजी के लिए अच्छा है, लेकिन यह पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है। जैसे-जैसे शेर घने जंगलों को छोड़कर बंजर भूमि, कृषि क्षेत्रों और शहरी इलाकों के करीब पहुंच रहे हैं, इंसानों और शेरों के बीच टकराव का खतरा काफी बढ़ गया है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के शोध भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि हाल के वर्षों में गुजरात के गांवों में पालतू जानवरों पर शेरों के हमलों की घटनाओं में तेजी आई है। इसके अलावा, नए और इंसानी दखल वाले इलाकों में जाने से शेरों को रेलवे लाइनों, व्यस्त हाईवे, खुले कुओं और खेतों के किनारे लगाए गए अवैध बिजली के तारों जैसी जानलेवा बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2020 से 2025 के बीच इन्हीं सब अवांछित कारणों से सैकड़ों शेरों की मौत भी हुई है।
गणना के तरीके और भविष्य की राह
इस बढ़ती आबादी के बीच वन्यजीव विशेषज्ञों ने शेरों की गिनती के तरीके पर भी ध्यान आकर्षित किया है। वन विभाग ने इस सर्वे में ‘न्यूनतम कुल गणना पद्धति’ का उपयोग किया था, जिसमें हजारों वन रक्षकों और वालंटियर्स ने 24 घंटे लगातार निगरानी करके आंकड़े जुटाए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरीके में मानवीय चूक या शेरों की दोहरी गिनती की गुंजाइश रहती है। उन्होंने भविष्य में कैमरा ट्रैप और मूंछों के धब्बों के आधार पर की जाने वाली अधिक सटीक ‘कैप्चर-रीकैप्चर’ तकनीक को अपनाने का सुझाव दिया है।
मेटास्ट्रिंग फाउंडेशन के सीईओ और शेर विशेषज्ञ रवि चेल्लम जैसे जानकारों का कहना है कि गिर क्षेत्र से शेरों का बाहर निकलना यह बताता है कि उनका मूल आवास अब पूरी तरह भर चुका है। भारत में एशियाई शेरों के सुरक्षित और दीर्घकालिक भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए, अब समुदाय आधारित प्रबंधन और शेरों को देश के अन्य सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने की दिशा में गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है।
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