भारत में हाथी गलियारों का विस्तार: संरक्षण और आजीविका के बीच गहराता संघर्ष

भारत के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में हाथी गलियारों
(Elephant Corridors) को सुरक्षित करना हमेशा से एक जटिल चुनौती भरा काम रहा है। हाल के महिनों में, विशेष रूप से फरवरी 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, सरकार द्वारा इन गलियारों के विस्तार के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में लाई गई तेजी ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। दक्षिण भारत के दो प्रमुख वन्यजीव क्षेत्रों – बिल्लीगिरी रंगनाथ स्वामी मंदिर (BRT) टाइगर रिजर्व और सत्यमंगलम टाइगर रिजर्व, के बीच के गलियारों को लेकर चर्चाएं अब नीतिगत गलियारों से निकलकर स्थानीय किसानों के खेतों तक पहुंच गई है।

हाथी गलियारों की बढ़ती अनिवार्यता

हाथी एक ‘कीस्टोन प्रजाति’ है, जिसे जीवित रहने और अपनी आनुवंशिक विविधता बनाए रखने के लिए बड़े भू-भाग की आवश्यकता होती है। दिसंबर 2024 में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्ट के बाद, भारत में चिह्नित गलियारों की संख्या 150 तक पहुँच गई है। इन गलियारों का मुख्य उद्देश्य हाथियों के विखंडित आवासों को जोड़ना है। जब ये रास्ते बाधित होते हैं, तो हाथियों का झुंड बस्तियों और खेतों की ओर रुख करता है, जिससे ‘मानव-हाथी संघर्ष’ (Human-Elephant Conflict) की घटनाएँ बढ़ती हैं। 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, इन संघर्षों में होने वाली मौतों और फसलों के नुकसान में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जिसने सरकार को कड़े कदम उठाने पर मजबूर किया है।

BRT और सत्यमंगलम: एक महत्वपूर्ण जंक्शन

कर्नाटक का BRT टाइगर रिजर्व और तमिलनाडु का सत्यमंगलम टाइगर रिजर्व, पूर्वी और पश्चिमी घाटों के मिलन स्थल पर स्थित हैं। यह क्षेत्र दुनिया में एशियाई हाथियों की सबसे सघन आबादी का घर है। यहाँ का ‘कोल्लेगल-सत्यमंगलम’ गलियारा हाथियों के मौसमी प्रवास के लिए जीवन रेखा माना जाता है। सरकार की वर्तमान योजना के तहत, इस मार्ग में आने वाली निजी कृषि भूमि और राजस्व भूमि को ‘इको-सेंसिटिव जोन’ (ESZ) के तहत अधिग्रहित करने या वहां की गतिविधियों को प्रतिबंधित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

किसानों की आजीविका पर संकट

भूमि अधिग्रहण की इस तेज़ प्रक्रिया ने स्थानीय किसान समुदायों, विशेषकर चामराजनगर और इरोड जिलों के सीमावर्ती गांवों में असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। किसानों का तर्क है कि उनकी पीढ़ियाँ इन जमीनों पर खेती कर रही हैं और अचानक भूमि का वन्यजीव क्षेत्र में तब्दील होना उनकी आर्थिक रीढ़ तोड़ देगा।

  • अपर्याप्त मुआवजा: कई किसानों का दावा है कि सरकार द्वारा दिए जाने वाले मुआवजे की राशि बाज़ार दर से काफी कम है।
  • फसल सुरक्षा का अभाव: अधिग्रहण की प्रक्रिया के दौरान ‘एलिफेंट-प्रूफ ट्रेंच’ (EPT) और सोलर फेंसिंग का काम अधूरा रहने से हाथियों द्वारा बची-कुची फसलों को नष्ट करने का डर बना रहता है।
  • कानूनी पेच: वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत मिलने वाले सामुदायिक अधिकारों और संरक्षण नीतियों के बीच अक्सर टकराव देखा जा रहा है।

संरक्षण की नई रणनीतियाँ और चुनौतियाँ

सरकार अब केवल भूमि अधिग्रहण पर ही निर्भर नहीं है। 2025 के अंत में कर्नाटक सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘एलिफेंट कॉरिडोर पॉलिसी’ में निजी-सार्वजनिक भागीदारी (PPP) और स्वैच्छिक पुनर्वास की बात कही गई है। कुछ क्षेत्रों में ‘कंजर्वेशन ईज़मेंट’ (Conservation Easements) जैसे मॉडल अपनाए जा रहे हैं, जहाँ ज़मीन किसान की ही रहती है, लेकिन वह वहां ऐसी फसलें नहीं उगाता जो हाथियों को आकर्षित करें, जिसके बदले उसे वार्षिक वित्तीय सहायता दी जाती है।

हालाँकि, ज़मीनी हकीकत यह है कि बुनियादी ढांचे के विकास, जैसे कि राजमार्गों का चौड़ीकरण और रिसॉर्ट्स का निर्माण, अभी भी इन गलियारों के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं। पर्यावरणविदों का मानना है कि जब तक बड़े कॉर्पोरेट अतिक्रमणों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक केवल छोटे किसानों की भूमि का अधिग्रहण संघर्ष को कम करने के बजाय सामाजिक असंतोष को बढ़ावा देगा।

तकनीक का बढ़ता हस्तक्षेप

2026 की शुरुआत से, इन संवेदनशील क्षेत्रों में ‘AI-आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम’ का परीक्षण तेज़ कर दिया गया है। सेंसर और थर्मल कैमरों के ज़रिए हाथियों की आवाजाही की रीयल-टाइम सूचना किसानों के मोबाइल पर भेजने की व्यवस्था की जा रही है। इसका उद्देश्य यह है कि बिना किसी बड़े विस्थापन के मानव और वन्यजीव सह-अस्तित्व को संभव बनाया जा सके। लेकिन प्रश्न अभी भी वही है: क्या तकनीक और नीतियाँ उन किसानों के घावों को भर पाएंगी जिनकी आजीविका का एकमात्र साधन उनकी भूमि है?

Source: PIB – Elephant Corridors in India 2024


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