मानव वन्यजीव संघर्ष: ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षा कवन बनती आधुनिक बाड़बंदी

भारत जैसे विशाल जैव-विविधता वाले देश में मानव और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व हमेशा से एक चुनौती रहा है। हाल के सालों में बढ़ती मानव जनसंख्या, जंगलों के सिमटने और वन्यजीवों के गलियारों में मानवीय हस्तक्षेप के कारण “मानव वन्यजीव संघर्ष” की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है।  आंकड़ों के मुताबिक, हर साल सैंकड़ों लोग इन संघर्षों में अपनी जान गंवाते हैं और हजारों एकड़ फसलें बर्बाद हो जाती है। इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए, केंद्र और अलग-अलग राज्य सरकारें अब ग्रामीण क्षेत्रों और जंगल की सीमाओं पर आधुनिक बाड़बंदी को एक असरदार “सुरक्षा कवच” के रूप में अपना रही है।

बाड़बंदी की जरूरत और मौजूदा संकट

ग्रामीण भारत, विशेष रूप से वे गांव जो नेशनल पार्कों या वन्यजीव अभयारण्यों के पास स्थित है, लगातार जंगली जानवरों के आक्रमण के साये में रहते हैं। हाथी, बाघ, तेंदुआ और जंगली सूअर जैसे जानवर अक्सर भोजन और पानी की तलाश में बस्तियों का रुख करते हैं। इससे न केवल जान-माल का नुक्सान होता है, बल्कि ग्रामीणों में वन्यजीवों के प्रति आक्रोश भी बढ़ता है, जिससे कभी-कभी जानवरों को भी अपनी जान गवानी पड़ती है। इस बढ़ते “मानव वन्यजीव संघर्ष” को रोकने के लिए बाड़ लगाना सबसे प्राथमिक और भौतिक समाधान बनकर उभरा है।

आधुनिक बाड़बंदी के विभिन्न प्रकार

वर्तमान में पारंपरिक दीवारों या कटीले तारों के बजाय तकनीक-आधारित बाड़बंदी पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है:

  1. सोलर पावर फेंसिंग: यह वर्तमान में सबसे लोकप्रिय तरीका है। इसमें बाड़ के तारों में सौर ऊर्जा से उत्पन्न हल्का करंट प्रवाहित किया जाता है। जब कोई जानवर इसे छूता है, तो उसे एक सुरक्षित लेकिन प्रभावी झटका लगता है, जिससे वह जानवर दोबारा उस फेंसिंग को पार करने की हिम्मत नहीं करता। यह जानवरों के लिए जानलेवा नहीं होता, लेकिन एक मनोवैज्ञानिक डर पैदा करता है।
  2. चेन-लिंक फेंसिंग: उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बाघों और तेंदुओ को रोकने के लिए भारी लोहे की जाली (Chain-link) का उपयोग किया जा रहा है। यह मुख्य रूप से उन संवेदनशील रास्तों पर लगाई जाती है जहां से हिंसक जानवर अक्सर गांवों में प्रवेश करते हैं।
  3. स्मार्ट और वर्चुअल बाड़: दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में सेंसर आधरित बाड़ का परीक्षण किया जा रहा है। जैसे ही कोई बड़ा जानवर बाड़ के दायरे में आता है, वैसे ही सेंसर सक्रिय हो जाता है और सायरन या फ्लैश लाइट के जरिए ग्रामीणों और वन विभाग को अलर्ट कर देता है।
  4. हाथी रोधी खाई: बाड़ के साथ-साथ कई राज्यों में गहरी खाइयाॅं भी खोदी जा रही है, जिन्हें हाथी पार नहीं कर सकते।

प्रमुख राज्यों की पहल और सफलता के आंकड़े

उत्तर प्रदेश सरकार ने तराई क्षेत्रों में लगभग 272 किलोमीटर लंबी सुरक्षा बाड़ का निर्माण किया है। पीलीभीत और लखीमपुर खीरी जैसे जिलों में इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं, जहां बाघों के रिहाइशी इलाकों में आने की घटनाओं में कमी आई है।

वहीं, उत्तराखंड में “मानव वन्यजीव संघर्ष शमन” योजना के तहत पहाड़ी गांवों के चारों ओर सोलर फेंसिंग को प्राथमिकता दी जा रही है।

दक्षिण भारत में कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने हाथियों के संघर्ष को रोकने के लिए सौलर फेंसिंग के साथ-साथ “क्रैश बैरियर” (पुराने रेल पटरियों का उपयोग) का सफल प्रयोग किया है। ये बैरियर इतने मजबूत होते हैं कि हाथी इन्हें तोड़कर खेतो में प्रवेश नहीं कर पाते।

चुनौतियाॅं और रखरखाव का प्रश्र

हालांकि बाड़बंदी एक असरदार उपाय है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियाॅं भी है। बाड़ का नियमित रखरखाव सबसे बड़ी समस्या है। अक्सर झाड़ियां उगने या तारों के टूटने से करंट का प्रवाह रुक जाता है, जिससे बाड़ बेअसर हो जाता है। इसके अलावा, हाथियों जैसे बुद्धिमान जानवर कभी-कभी पेड़ों की सूखी टहनियां बाड़ पर डालकर करंट को बेअसर करने की कला भी सीख लेते हैं। इसलिए, सरकारों का अब ध्यान “कम्युनिटी फेंसिंग” पर है, जहां ग्रामीणों को ही बाड़ की देखभाल की जिम्मेदारी और प्रशिक्षण दिया जाता है।

इकोलॉजिकल संतुलन और भविष्य की राह

यह समझना महत्वपूर्ण है कि बाड़बंदी केवल एक रक्षात्मक उपाय है। लंबी अवधि में मानव वन्यजीव संघर्ष को खत्म करने के लिए वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित करना और उनके गलियारों को अतिक्रमण मुक्त बनाना अनिवार्य है। बाड़ लगाने का उद्देश्य जानवरों को कैद करना नहीं, बल्कि उन्हें उनके सुरक्षित क्षेत्र में रखना और ग्रामीणों को एक भयमुक्त वातावरण प्रदान करना है।

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