पूरी दुनिया जहाॅं जलवायु परिवर्तन और घटते वनों के संकट से जूझ रही है, वहीं भारत का पड़ोसी देश नेपाल “पर्यावरण नायक” बनकर उभरा है। हालिया आंकड़ों और अंतरराष्ट्रीय शोध रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल ने पिछले 24 सालों में अपने वन क्षेत्र को लगभग दोगुना कर लिया है। सामुदायिक भागीदारी के इस अनूठे माॅडल ने वैश्विक स्तर पर सुर्खियाॅं बटोरी है। लेकिन, क्या यह सफलता इतनी ही सुन्हरी है जितनी दिखाई देती है? विशेषज्ञों का मानना है कि संरक्षण के इस चमकदार पर्दे के पीछे सामाजिक असमानता और वन्यजीव संघर्ष जैसी गंभीर चुनौतियां बरकरार हैं।
कैसे बदला नेपाल का भूगोल?
1970 और 80 के दशक में नेपाल के पहाड़ों पर बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हुई थी, जिससे भूस्खलन और बाढ़ का खतरा बढ़ गया था। 1990 के दशक की शुरुआत में नेपाल सरकार ने एक क्रांतिकारी निर्णय लिया – वनों का नियंत्रण स्थानीय लोगों को सौंप दिया गया।
1993 के वन अधिनियम ने स्थानीय समुदायों को ‘सामुदायिक वन उपभोक्ता समूह’ (CFUGs) बनाने की अनुमति दी। परिणाम यह हुआ कि:
- 1992 में नेपाल का कुल वन क्षेत्र लगभग 26% था।
- 2016 की फॉरेस्ट रिसोर्स असेसमेंट (FRA) रिपोर्ट के अनुसार, यह बढ़कर 44.74% हो गया।
- वर्तमान में, देश का लगभग 45.3% हिस्सा वन क्षेत्र हो चुका है।
सामुदायिक वन संरक्षण: दुनिया के लिए एक केस स्टडी
नेपाल की सफलता का मुख्य आधार ‘स्थानीय स्वामित्व’ है। जब लोगों को यह अहसास हुआ कि जंगल उनके अपने हैं और उनसे मिलने वाली घास, जलावन और जड़ी-बूटियों पर उनका अधिकार है, तो उन्होंने खुद पहरेदारी शुरू कर दी। आज नेपाल में 22,000 से अधिक ऐसे समूह हैं जो देश के 23 लाख हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र का प्रबंधन कर रहे हैं। इस मॉडल ने न केवल हरियाली लौटाई, बल्कि पहाड़ी ढलानों पर मिट्टी के कटाव को भी रोका।
चुनौती 1: ‘अभिजात वर्ग का कब्जा’
नेपाल के इस मॉडल की सबसे बड़ी आलोचना सामाजिक न्याय को लेकर हो रही है। ‘नेचर सस्टेनेबिलिटी’ में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, सामुदायिक वनों के प्रबंधन में स्थानीय प्रभावशाली और उच्च आय वाले लोगों का दबदबा है।
अक्सर यह देखा गया है कि वनों से मिलने वाले आर्थिक लाभ, जैसे लकड़ी की बिक्री से होने वाली आय, का बड़ा हिस्सा अमीर तबके के पास चला जाता है। गरीब लोग, जो सदियों से जंगलों पर निर्भर रहे हैं, उन्हें अक्सर ‘संरक्षण’ के नाम पर लकड़ी या चारे के लिए जंगलों में जाने से रोक दिया जाता है या उन पर कड़े नियम थोप दिए जाते हैं। यह “हरियाली” गरीबी मिटाने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाई है।
चुनौती 2: जैव विविधता और ‘ग्रीन डेजर्ट’ का खतरा
वन क्षेत्र तो बढ़ा है, लेकिन क्या जंगलों की गुणवत्ता भी सुधरी है? विशेषज्ञों का कहना है कि कई जगहों पर सामुदायिक समूहों ने तेजी से बढ़ने वाले और व्यावसायिक महत्व वाले पेड़ों (जैसे चीड़ या पाइन) को प्राथमिकता दी है।
पाइन के जंगल घने तो दिखते हैं, लेकिन वे स्थानीय जैव विविधता के लिए अनुकूल नहीं होते। पाइन की पत्तियां जमीन पर गिरने के बाद मिट्टी को अम्लीय बना देती हैं, जिससे वहां अन्य वनस्पतियां या फलदार पेड़ नहीं उग पाते। इसे वैज्ञानिक ‘ग्रीन डेजर्ट’ (हरा रेगिस्तान) कहते हैं – जंगल तो है, लेकिन वहां पशु-पक्षियों के लिए भोजन और आवास की कमी है।
चुनौती 3: बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष
जंगलों के विस्तार और बहाली का एक डरावना पहलू भी सामने आया है। जैसे-जैसे जंगलों का घनत्व बढ़ा है, बाघ, तेंदुए और हाथियों की आबादी में भी वृद्धि हुई है। चूंकि जंगलों में प्राकृतिक शिकार और फलों के पेड़ों की कमी है, इसलिए जंगली जानवर भोजन की तलाश में बस्तियों का रुख कर रहे हैं।
नेपाल के तराई क्षेत्रों और मध्य-पहाड़ी इलाकों में इंसानों और पशुओं के बीच संघर्ष की घटनाएं कई गुना बढ़ गई हैं। खेती बर्बाद होना और मवेशियों का शिकार होना अब ग्रामीणों के लिए रोज की समस्या बन गई है, जिससे संरक्षण के प्रति स्थानीय लोगों का मोहभंग होने का खतरा है।
चुनौती 4: आर्थिक उपयोग बनाम पूर्ण संरक्षण
नेपाल के वनों के साथ एक अजीब विडंबना जुड़ी है। देश में प्रचुर मात्रा में वन संपदा होने के बावजूद, नेपाल अपनी घरेलू जरूरतों के लिए मलेशिया और अन्य देशों से लकड़ी आयात करता है।
इसका कारण यह है कि सामुदायिक समूहों के पास ‘वैज्ञानिक वन प्रबंधन’ के लिए पर्याप्त तकनीकी ज्ञान और संसाधन नहीं हैं। सरकारी नियम इतने जटिल हैं कि स्थानीय लोग कानूनी रूप से लकड़ी का व्यापार नहीं कर पाते। वन संरक्षण केवल ‘देखने’ तक सीमित रह गया है, उसे ‘आजीविका’ का जरिया बनाने में अभी भी कानूनी और प्रशासनिक अड़चनें हैं।
चुनौती 5: जलवायु परिवर्तन और वनाग्नि की विकरालता
बढ़ता तापमान और लंबे समय तक रहने वाला सूखा नेपाल के इन संरक्षित वनों के लिए काल बन रहा है। हर साल गर्मियों में हज़ारों हेक्टेयर जंगल आग की भेंट चढ़ जाते हैं। सामुदायिक समूहों के पास आग बुझाने के आधुनिक उपकरण नहीं हैं। इसके अलावा, हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते तापमान के कारण जंगलों की संरचना बदल रही है, जिससे कई स्थानीय प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं।
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