भारत ने पर्यावरण संरक्षण और जैव-विविधता के संरक्षण की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम रखा है। विश्व आर्द्रभूमि दिवस (2 फरवरी) के वैश्विक उत्सव से ठीक पहले, केंद्रिय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने घोषणा की है, कि भारत के रामसर नेटवर्क में 2 नई साइटें, उत्तर प्रदेश का पटना पक्षी अभयारण्य और गुजरात का छारी-ढंड – शामिल किया गया है। 31 जनवरी 2026 को की गई इस घोषणा के साथ ही भारत में रामसर साइटों की कुल संख्या अब बढ़कर 98 हो गई है।
इकोसिस्टम के लिए ‘संजीवनी’ हैं आर्द्रभूमियाँ
आर्द्रभूमियाँ, जिन्हें अक्सर ‘पृथ्वी के गुर्दे’ के रूप में जाना जाता है, हमारे इकोसिस्टम का एक अभिन्न अंग हैं। ये न केवल जल शुद्धिकरण और बाढ़ नियंत्रण में मदद करती हैं, बल्कि प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रय भी प्रदान करती हैं। भारत का रामसर नेटवर्क दक्षिण एशिया में सबसे बड़ा है, और इसमें नई साइटों का जुड़ना इस बात का प्रमाण है कि देश अपनी प्राकृतिक संपदा को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन कर रहा है।
पटना पक्षी अभयारण्य: उत्तर प्रदेश का अनमोल रत्न
उत्तर प्रदेश के एटा जिले में स्थित पटना पक्षी अभयारण्य राज्य की इकोलॉजिकल विविधता का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। हालांकि यह क्षेत्र में छोटा है, लेकिन इसका महत्व विशाल है। यह अभयारण्य मुख्य रूप से एक ‘झील’ आधारित आर्द्रभूमि है, जो सर्दियों के दौरान मध्य एशिया और साइबेरिया से आने वाले हजारों प्रवासी पक्षियों का स्वागत करता है।
इस स्थल को रामसर सूची में शामिल करने का मुख्य कारण इसकी विशिष्ट जैव विविधता है। यहाँ पक्षियों की 100 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें पिनटेल, शोवलर और ‘कॉमन टील’ जैसे जलपक्षी शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रामसर का दर्जा मिलने से इस क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय समुदायों को इसके संरक्षण के लाभों के बारे में जागरूक किया जा सकेगा।
छारी-ढंड: गुजरात के कच्छ का जीवन आधार
गुजरात के कच्छ जिले में स्थित ‘छारी-ढंड’ (Chhari-Dhand) एक अद्वितीय मौसमी आर्द्रभूमि है। सिंधी भाषा में ‘छारी’ का अर्थ खारा और ‘ढंड’ का अर्थ उथली झील होता है। यह आर्द्रभूमि कच्छ के शुष्क और अर्ध-शुष्क परिदृश्य के बीच मीठे पानी का एक प्रमुख स्रोत है।
छारी-ढंड न केवल अपनी भौगोलिक संरचना के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह लुप्तप्राय प्रजातियों जैसे ‘ग्रेटर फ्लेमिंगो’, ‘कॉमन क्रेन’ और विभिन्न प्रकार के शिकारी पक्षियों का प्रमुख प्रजनन और भोजन स्थल भी है। मानसून के दौरान यह क्षेत्र पानी से भर जाता है, जो रेगिस्तानी क्षेत्र में वन्यजीवों के लिए एक ओएसिस (Oasis) की तरह कार्य करता है। रामसर स्थल के रूप में इसकी मान्यता इसके संवेदनशील इकोसिस्टम को अवैध शिकार और अतिक्रमण से बचाने में मदद करेगी।
विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026 और भारत की भूमिका
इस साल का विश्व आर्द्रभूमि दिवस भारत के लिए विशेष महत्व रखता है। केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने पिछले एक दशक में अपने रामसर स्थलों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की है। यह वृद्धि न केवल ‘अमृत धरोहर’ योजना के तहत आर्द्रभूमियों के कायाकल्प की प्रतिबद्धता को दर्शाती है, बल्कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी सुनिश्चित करती है।
आर्द्रभूमियाँ जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने में भी सक्षम हैं। वे जंगलों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से कार्बन को अवशोषित करती हैं, जिसे ‘ब्लू कार्बन’ कहा जाता है। उत्तर प्रदेश और गुजरात की इन दो नई साइटों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने से वैश्विक स्तर पर भारत के संरक्षण प्रयासों की सराहना हो रही है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, ये साइटें अब वैश्विक अनुसंधान और संरक्षण अनुदान के लिए भी पात्र होंगी, जिससे इनके भविष्य को सुरक्षित करना आसान हो जाएगा।
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