गैंडा एक ऐसा वन्यजीव है, जिसकी प्रजातियाॅं विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी थी। एशियाई गैंडा
(Rhinoceros unicornis) जिसे भारतीय गैंडा या एक सींग वाला गैंडा भी कहा जाता है, आज के समय में भारत की वन्यजीव संरक्षण नीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के कारण यह प्रजाति विलुप्ति की रेखा से बाहर है। भारत ने गैंडे को संरक्षित करने के लिए अनेक ठोस कदम उठाए और उनमें सबसे बड़ी सफलता काजीरंगा नेशनल पार्क में देखने को मिलती है। आज के समय में भारत के काजीरंगा नेशनल पार्क में दुनिया के लगभग 70% एक सींग वाले गैंडे पाए जाते हैं, जो भारत की संरक्षण नीतियों की अद्भुत उपलब्धि को दर्शातें है।
गैंडों का महत्व
गैंडे केवल वन्यजीव का हिस्सा ही नहीं, बल्कि इकोसिस्टम के संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह घासों को नियंत्रित कर घास के मैदानों को संतुलित रखते हैं। गैंडे “छत्र प्रजाति” (Umbrella Species) माने जाते हैं, यानी इनके संरक्षण से अनेक अन्य जीव भी सुरक्षित रहते हैं। सांस्कृतिक दृष्टि से भी भारतीय गैंडे का उल्लेख प्राचीन साहित्य और ऐतिहासिक दस्तावेजों में मिलता है।
काजीरंगा गैंडों का सुरक्षित घर
असम राज्य के गोलाघाट और नौगाॅंव जिले में स्थित काजीरंगा नेशनल पार्क यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है। यह नेशनल पार्क लगभग 430 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है और ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे की हरी-भरी भूमि इसे अनोखा प्राकृतिक आवास बनाती है। यहाँ की आर्द्रभूमियाँ, दलदली क्षेत्र और घास के विशाल मैदान गैंडों के लिए आदर्श निवास स्थल हैं। यही कारण है कि काजीरंगा आज “एक सींग वाले गैंडे की राजधानी” कहलाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में गैंडों की संख्या तेजी से घटने लगी थी।
इसका मुख्य कारण था:
- अवैध शिकार (शिकारियों द्वारा गैंडे के सींग की तस्करी)
- आवास क्षेत्र का सिकुड़ना
- बाढ़ और मानव-वन्यजीव संघर्ष
1904 में असम के तत्कालीन मुख्य आयुक्त लॉर्ड कर्ज़न की पत्नी लेडी कर्ज़न ने गैंडे के संरक्षण के लिए विशेष कदम उठाने की पहल की। परिणामस्वरूप 1905 में इसे रिज़र्व फॉरेस्ट घोषित किया गया और बाद में नेशनल पार्क का दर्जा मिला।
गैंडों की आबादी में वृद्धि
भारत सरकार, असम सरकार और स्थानीय समुदायों के सहयोग से गैंडों की संख्या बढ़ने लगी। 1905 में जब संरक्षण शुरू हुआ, तब गिने-चुने गैंडे ही बचे थे। 1970 के दशक तक इनकी संख्या सैकड़ों में पहुँची। 2022 के सर्वेक्षणों के अनुसार काजीरंगा में लगभग 2,600 से अधिक गैंडे हैं। यह आँकड़ा विश्व की कुल आबादी का लगभग 70% है।
संरक्षण के प्रयास
1. सख्त कानून और सुरक्षा: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 ने गैंडों को उच्चतम सुरक्षा श्रेणी में रखा। अवैध शिकार रोकने के लिए गश्त बढ़ाई गई, आधुनिक हथियार और तकनीक से सुरक्षा बलों को तैनात किया गया।
2. जन-जागरूकता: स्थानीय समुदायों को गैंडों का महत्व समझाया गया। पर्यटन से होने वाले आय का लाभ भी दिया गया, जिससे वे संरक्षण में सहयोगी बने।
3. बाढ़ प्रबंधन: काजीरंगा में हर साल ब्रह्मपुत्र नदी की बाढ़ आती है। गैंडों की सुरक्षा के लिए ऊँचे बनावटी टीले बनाए गए ताकि जानवर बाढ़ से बच सकें।
4. तकनीकी सहायता: ड्रोन, कैमरा ट्रैप और जीपीएस आधारित निगरानी प्रणाली ने निगरानी को और प्रभावी बनाया है।
5. प्रजनन और पुनर्वास: काजीरंगा की अतिरिक्त आबादी को अन्य नेशनल पार्कों और अभयारण्यों (जैसे मानस, ओरांग, पोबीतोरा) में पुनर्वासित किया गया, ताकि गैंडे का वितरण क्षेत्र व्यापक हो।
चुनौतियाँ अभी भी बरकरार
संरक्षण की सफलता के बावजूद गैंडे कई तरह के खतरो का सामना कर रहे है:
- अवैध शिकार: गैंडे का सींग आज भी अंतरराष्ट्रीय काले बाज़ारो में ऊँचे दामों पर बिकते है।
- प्राकृतिक आपदाएँ: बाढ़ और महामारी गैंडों की बड़ी संख्या को प्रभावित कर सकती हैं।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष: खेती की ज़मीन और गैंडे के आवास के बीच बढ़ती नज़दीकी संघर्ष की स्थिति पैदा करती है।
- जलवायु परिवर्तन: बदलते मौसम और ब्रह्मपुत्र नदी के स्वरूप में परिवर्तन से गैंडों के आवास पर असर पड़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मान्यता
भारत की इस सफलता को दुनिया भर में सराहा गया है।काजीरंगा नेशनल पार्क को न केवल यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है, बल्कि World Wildlife Fund (WWF), इंटरनेशनल राइनो फाउंडेशन जैसी संस्थाएँ भी भारत के प्रयासों को समर्थन देती हैं।
भविष्य की राह
गैंडों की स्थायी सुरक्षा के लिए जरूरी है:
- स्थानीय समुदायों को और अधिक सशक्त करना।
- अवैध शिकार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना।
- काजीरंगा पर अत्यधिक दबाव कम करने के लिए अन्य अभयारण्यों में गैंडे की संख्या बढ़ाना।
- जलवायु परिवर्तन और बाढ़ नियंत्रण के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनाना।
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