हिमालय का अस्तित्व: जम्मू-कश्मीर की घाटियों में ‘वेस्ट मैनेजमेंट एक्ट’ बना ढाल

श्रीनगर: हिमालय की गगनचुंबी चोटियां और जम्मू-कश्मीर की मखमली घाटियां केवल पर्यटन का कैन्द्र नहीं है, बल्कि ये एक अत्यंत नाजुक इकोसिस्टम का हिस्सा है। पिछले कुछ दशकों में बढ़ते शहरीकरण, अनियंत्रित पर्यटन और बदलती जीवनशैली ने इन शांत वादियों के सामने कचरे का एक विशाल पहाड़ खड़ा कर दिया है। इस गंभीर संकट से निपटने और हिमालयी जैव-विविधता को सुरक्षित रखने के लिए “Solid Waste Management Act” का प्रभावी होना अब एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का सबसे अनिवार्य अस्त्र बन गया है।

संकट के मुहाने पर हिमालयी इकोलॉजी

हिमालयी क्षेत्र अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण पर्यावरण के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। जम्मू-कश्मीर में झेलम, चिनाब और सिंधु जैसी नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में कचरे का अनियंत्रित जमाव न केवल स्थानीय जल स्रोतों को दूषित कर रहा है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता और वन्यजीवों के स्वास्थ्य पर भी घातक प्रहार कर रहा है।

पर्वतीय क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती यहाँ का भूभाग है। मैदानी इलाकों के विपरीत, यहाँ लैंडफिल साइट्स (कचरा डंप करने की जगह) के लिए समतल भूमि का अभाव है। अक्सर देखा गया है कि कचरे को खाइयों या नदियों के किनारों पर फेंक दिया जाता है, जो जल प्रदूषण और जलीय जीवों की मृत्यु का कारण बनता है।

सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट एक्ट: एक कानूनी सुरक्षा कवच

सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट एक्ट, 2016 (समय-समय पर संशोधित) हिमालयी क्षेत्रों के लिए विशेष दिशा-निर्देश प्रदान करता है। इस कानून का प्राथमिक उद्देश्य कचरे को उसके उत्पादन स्थल पर ही प्रबंधित करना है। जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में, यह एक्ट स्थानीय निकायों और प्रशासन को यह शक्ति देता है कि वे कचरे के पृथक्करण (Segregation) को अनिवार्य बनाएं। इसके तहत कचरे को तीन श्रेणियों – गीला, सूखा और घरेलू कचरों-में बांटना अनिवार्य है।

हिमालयी घाटियों में इस एक्ट का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यहाँ ‘बायोडिग्रेडेबल’ कचरा कम तापमान के कारण सड़ने में मैदानी इलाकों की तुलना में दोगुना समय लेता है। एक्ट के प्रावधानों के अनुसार, जैविक कचरे के लिए स्थानीय स्तर पर ही कंपोस्टिंग या बायोगैस संयंत्रों को बढ़ावा देना अनिवार्य है, ताकि परिवहन की लागत और जोखिम को कम किया जा सके।

पर्यटन और प्लास्टिक का घातक गठजोड़

गुलमर्ग, पहलगाम और सोनमर्ग जैसे पर्यटन स्थलों पर हर साल लाखों सैलानी पहुँचते हैं। पर्यटन अर्थव्यवस्था के लिए तो अच्छा है, लेकिन अपने पीछे यह ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ और पैकेज्ड कचरे की एक लंबी विरासत छोड़ जाता है। सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट एक्ट यहाँ ‘एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (EPR) पर जोर देता है।

इसका अर्थ है कि प्लास्टिक पैकेजिंग बनाने वाली कंपनियों की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वे अपने उत्पादों से होने वाले कचरे को वापस इकट्ठा करने और रिसायकल करने की व्यवस्था करें। एक्ट के तहत ऊंचाई वाले क्षेत्रों में प्लास्टिक के उपयोग पर कड़े प्रतिबंध और उल्लंघनकर्ताओं पर भारी जुर्माने का प्रावधान है, जो नाजुक घास के मैदानों को प्लास्टिक के जाल में फंसने से बचाने के लिए आवश्यक है।

भविष्य की राह और तकनीक का संगम

हिमालयी घाटियों के लिए अब ‘विकेंद्रीकृत अपशिष्ट प्रबंधन’ (Decentralized Waste Management) समय की मांग है। सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट एक्ट छोटे शहरों और गांवों को स्वतंत्र बनाने की दिशा में काम करता है। अत्याधुनिक तकनीक जैसे कि छोटे इंसिनरेटर (जो कम प्रदूषण फैलाते हैं) और सौर ऊर्जा संचालित कचरा प्रोसेसिंग यूनिट्स का उपयोग जम्मू-कश्मीर के दूरदराज के इलाकों में किया जा रहा है।

हिमालय की नाजुकता को देखते हुए, कचरा प्रबंधन की हर योजना में ‘पर्यावरणीय प्रभाव आकलन’ (EIA) को प्राथमिकता दी जा रही है। यह कानून केवल कूड़ा उठाने के बारे में नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी संस्कृति विकसित करने के बारे में है जहाँ हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझे।


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