हमारे आंगन की चहचहाहट कहाँ गई? जानिए गौरैया के गायब होने के पीछे का कारण और वर्तमान में किए जा रहे इनके संरक्षण के लिए प्रयास

हमारे आंगन और छतों पर फुदकने वाली गौरेया आज एक दुर्लभ पक्षी बनती जा रही है। पर्यावरण प्रेमी और वैज्ञानिक लंबे समय से गौरैया के गायब होने के कारण तलाशने और इनके संरक्षण पर काम कर रहे है। इसी दिशा में दिल्ली के गढ़ी मांडू वन क्षेत्र में एक अनोखा ‘गौरैया ग्राम’ बनाया गया था। लेकिन, प्रकृति को कुछ और ही मंजूर था। साल 2023 की विनाशकारी बाढ़ और उसके बाद आए तूफानों ने इस शानदार पहल को भारी नुकसान पहुंचाया है। आइए जानते हैं कि जुलाई 2026 में इस ‘गौरैया ग्राम’ की जमीनी स्थिति क्या है और इसे दोबारा आबाद करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

क्या हैं गौरैया के गायब होने के कारण?

अगर हम गौरैया के गायब होने के कारण पर गौर करें, तो सबसे बड़ी वजह हमारा बदलता लाइफस्टाइल और बढ़ता शहरीकरण है।

  • बदलते घर: पहले घरों में रोशनदान और कच्चे हिस्से होते थे जहाँ ये आसानी से घोंसले बनाती थीं। लेकिन आज की कांच और कंक्रीट वाली एयर-कंडीशन्ड इमारतों में इनके लिए कोई जगह नहीं बची है।
  • रसायनों का जहर: खेतों और बगीचों में रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल ने उन छोटे कीड़ों को खत्म कर दिया है, जो गौरैया के चूजों का मुख्य और हाई-प्रोटीन भोजन होते हैं। सही पोषण न मिलने से इनके बच्चे जीवित नहीं रह पाते।

‘गौरैया ग्राम’ पर कुदरत की मार: 2023 की ऐतिहासिक बाढ़

दिल्ली के राज्य पक्षी ‘गौरैया’ को बचाने के लिए पूर्वी दिल्ली के गढ़ी मांडू जंगल में जो 42 एकड़ का विशेष इको-सिस्टम तैयार किया गया था, वह पिछले कुछ सालों में भयंकर प्राकृतिक आपदाओं का शिकार हुआ है। जुलाई 2023 में यमुना नदी में आई ऐतिहासिक बाढ़ ने इस पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लिया था। यहाँ 12 फीट तक पानी भर गया था, जिससे ‘गौरैया ग्राम’ का एक बहुत बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया और लंबे समय तक वीरान पड़ा रहा।

तूफानों ने तोड़े कृत्रिम घोंसले और इन्सेक्ट होटल

बाढ़ का पानी उतरने के बाद जो ढांचा बचा था, उसे दिल्ली-एनसीआर में आए तेज आंधी-तूफानों ने भारी नुकसान पहुंचाया। यहाँ गौरैयों के लिए विशेष रूप से बनाए गए ‘इन्सेक्ट होटल’ (कबाड़ और लकड़ियों से बना वह ढांचा जहाँ कीड़े पनपते थे) पूरी तरह से कीचड़ और गंदगी से भर गए। पर्यटकों के बैठने के लिए बनाए गए शेड टूटकर नष्ट हो गए। जो बर्डहाउस बचे भी थे, उन पर जंगली कबूतरों ने कब्जा कर लिया।

पुननिर्माण और उम्मीद की किरण

लगातार आपदाओं की मार झेलने के बाद, जुलाई 2026 में अब यह ‘गौरैया ग्राम’ पुनर्निर्माण और बहाली के दौर से गुजर रहा है। वन विभाग ने नुकसान का विस्तार से आकलन कर लिया है और इसे दोबारा उसके पुराने स्वरूप में लाने का काम चल रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि गौरैया और इंसान हमेशा से एक साथ सह-अस्तित्व में रहते आए हैं। अब यहाँ प्राथमिकता के आधार पर बीज वाली घास, झाड़ियां और नए सुरक्षित कृत्रिम घोंसले मुहैया कराए जा रहे हैं। अगर ये प्रयास सफल रहे, तो उम्मीद है कि दिल्ली का यह ‘गौरैया ग्राम’ एक बार फिर से इन नन्हें परिंदों की मीठी चहचहाहट से गूंज उठेगा।


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