देश के सबसे प्रतिष्ठित और संकटग्रस्त पक्षी “ग्रेट इंडियन बस्टर्ड” को विलुप्त होने से बचाने की दिशा में भारत ने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, राजस्थान में चल रहे “प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड” के कैप्टिव ब्रीडिंग (कृत्रिम परिवेश में प्रजनन) कार्यक्रम ने अपने चौथे वर्ष में सफलतापूर्वक प्रवेश कर लिया है। इस हफ्ते राजस्थान के संरक्षण प्रजनन केंद्र में दो नए चूजों के जन्म के साथ, कृत्रिम देख-रेख में रह रहे इन पक्षियों की कुल संख्या अब 70 तक पहुंच गई है।
प्राकृतिक और कृत्रिम गर्भाधान का अनूठा संगम

इस बार की सफलता इसलिए भी विशेष है क्योंकि जिन दो चूजों ने जन्म लिया है, उनमें से एक का जन्म प्राकृतिक मिलन के जरिए हुआ है, जबकि दूसरा चूजा कृत्रिम गर्भाधान तकनीक की मदद से पैदा हुआ है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, संकटग्रस्त पक्षियों की प्रजनन दर बहुत कम होती है, ऐसे में कृत्रिम गर्भाधान जैसी आधुनिक तकनीकों का सफल प्रयोग इस प्रजाति के भविष्य के लिए एक संजीवनी साबित हो सकता है। यह तकनीक उन पक्षियों के लिए वरदान है जो प्राकृतिक रूप से प्रजनन करने में असमर्थ हैं।
संकट के मुहाने पर खड़ा “सोन चिरैया”
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, जिसे हिंदी में “सोन चिरैया” या “गोडावण” के नाम से भी जाना जाता है, वर्तमान में दुनिया के सबसे गंभीर रूप से संकटग्रस्त पक्षियों में से एक है। एक समय में यह पक्षी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के घास के मैदानों में पाया जाता था, लेकिन आज इनकी आबादी मुख्य रूप से राजस्थान के जैसलमेर और आसपास के शुष्क इलाकों तक ही सीमित रह गई है। अवैध शिकार, आवास का नुक्सान और हाई-वोल्टेज बिजली की लाइनों से टकराना इनके अस्तित्व के लिए सबसे बड़े खतरे रहे हैं। ऐसे में कैप्टिव ब्रीडिंग प्रोग्राम के जरिए इनकी संख्या बढ़ाना ही इन्हें बचाने का एकमात्र प्रभावी रास्ता नजर आ रहा है।
संरक्षण का अगला और सबसे चुनौतीपूर्ण चरण
पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सोशल मीडिया पर इस उपलब्धि को साझा करते हुए इसे प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) के लिए एक मील का पत्थर बताया है। उन्होंने संकेत दिया है कि सरकार अब इस परियोजना के अगले और सबसे कठीन चरण की ओर कदम बढ़ा रही हैं। इस साल कैप्टिव ब्रीडिंग सेंटर में पाले गए कुछ चूजों को धीरे-धीरे उनके प्राकृतिक आवास यानी “जंगल” में वापस छोड़ा जाएगा।
यह प्रक्रिया काफी जटिल होती है क्योंकि कृत्रिम वातावरण में पले-बढ़े पक्षियों को खुले जंगल के खतरों और वहां भोजन की तलाश करने के लिए तैयार करना एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए “साॅफ्ट रिलीज” तकनीक का उपयोग किया जा सकता है, जिसमें पक्षियों को पहले एक सुरक्षित बाड़े में रखा जाता है ताकि वे जंगली माहौल के आदी हो सकें।
राजस्थान वन विभाग की अहम भूमिका
इस सफलता के पीछे राजस्थान वन विभाग के अधिकारियों और वन्यजीव वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत छिपी हैं। जैसलमेर के पास स्थित यह ब्रीडिंग सेंटर अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है, जहाॅं अंडों को इकट्ठा करने से लेकर चूजों के निकलने तक उनकी चौबीसों घंटे निगरानी की जाती है। सेंटर में तापमान और नमी का विशेष ध्यान रखा जाता है ताकि चूजों के जीवित रहने की संभावना को अधिकतम किया जा सके। सरकार ने इस उपलब्धि के लिए स्थानीय वन अधिकारीयों और विशेषज्ञों की टिम की सराहना की है, जो विषम परिस्थितियों में भी इस दुर्लभ पक्षी को बचाने में जुटे हुए हैं।
प्रधानमंत्री के नेतृत्व में पर्यावरण संरक्षण की दिशा
परियोजना की सफलता को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पर्यावरण के प्रति संवेदनशील नेतृत्व से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार का लक्ष्य न केवल ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की संख्या बढ़ाना है, बल्कि उनके प्राकृतिक आवास यानी घास के मैदानों को भी सुरक्षित करना है। वर्तमान में जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में इन पक्षियों के संरक्षण के लिए विशेष काॅरिडोर और सुरक्षित क्षेत्र बनाए गए हैं, जहां मानव हस्तक्षेप और मवेशियों की चराई पर कड़ा नियंत्रण रखा जाता है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड न केवल एक पक्षी है, बल्कि यह हमारे इकोसिस्टम के स्वास्थ्य का सूचक भी है। अगर इनकी संख्या में इसी तरह निरंतर सुधार होता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब जैसलमेर की धरती पर एक बार फिर बड़ी संख्या में इन राजसी पक्षियों को स्वतंत्र रूप से उड़ते हुए देखा जा सकेगा। फिलहाल, 70 की यह संख्या विशेषज्ञों और पर्यावरण प्रेमियों के बीच उम्मीद की एक नई किरण जगा रही है।
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