आज पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु संकट से जूझ रही है। इसका असर सिर्फ इंसानों या जानवरों पर ही नहीं, बल्कि हमारे जंगलों और पेड़-पौधों पर भी भयानक रूप से पड़ रहा है। हाल ही में ‘जर्नल ‘साइंस’ में प्रकाशित एक वैश्विक अध्ययन ने जलवायु परिवर्तन और पौधों की विलुप्ति को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, इस सदी के अंत तक दुनिया भर में पौधों की 16 प्रतिशत से ज्यादा प्रजातियां हमेशा के लिए खत्म हो सकती हैं। आइए विस्तार से समझते हैं कि इस रिपोर्ट में क्या चेतावनियां दी गई हैं और इसके पीछे का मुख्य कारण क्या है।
आवासों का नष्ट होना है असली वजह
अब तक यह माना जाता था कि जलवायु परिवर्तन के कारण पौधे नई और ठंडी जगहों पर तेजी से नहीं फैल पा रहे हैं, जिसकी वजह से वे खत्म हो रहे हैं। लेकिन वैज्ञानिकों ने 67,664 प्रजातियों (दुनिया की ज्ञात वनस्पति का 18 प्रतिशत) का गहराई से अध्ययन किया और पाया कि जलवायु परिवर्तन और पौधों की विलुप्ति के बीच असली कड़ी ‘प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना’ है।
बढ़ते तापमान के कारण पौधों के अनुकूल रहने लायक जगहें बहुत तेजी से सिकुड़ रही हैं। उन्हें पनपने के लिए जो वातावरण चाहिए, वह खत्म हो रहा है, जिससे वे अपने मूल स्थानों से ही विलुप्त होने की कगार पर हैं।
दुनिया के किन हिस्सों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
इस अध्ययन में बताया गया है कि जलवायु संकट का असर पूरी दुनिया पर एक जैसा नहीं होगा। कुछ क्षेत्रों की जैव विविधता पूरी तरह उजड़ जाएगी, तो कहीं नए बदलाव देखने को मिलेंगे:
- भारी नुकसान वाले क्षेत्र: यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, और पश्चिमी अमेरिका जैसे क्षेत्रों में पौधों की विविधता में भारी गिरावट आएगी। सबसे बुरा हाल ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों का होगा, जहां 30% से अधिक प्रजातियां विलुप्ति के खतरे में हैं।
- नए पौधों का आगमन: इसके विपरीत, भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, दक्षिण अमेरिका और अमेरिका के कुछ नम क्षेत्रों में स्थानीय जैव विविधता बढ़ सकती है। यहां जलवायु परिवर्तन के कारण नई प्रजातियां आ सकती हैं, लेकिन यह पुराने और मूल पौधों की कीमत पर होगा।
इकोसिस्टम पर पड़ेगा गहरा प्रभाव
यदि जलवायु परिवर्तन और पौधों की विलुप्ति की यह रफ्तार ऐसे ही जारी रही, तो भविष्य में दुनिया के जंगल पूरी तरह से बदल जाएंगे।
- परागण तंत्र में बाधा: जो पौधे सदियों से किसी खास जगह पर उग रहे थे, उनके नष्ट होने से उन पर निर्भर कीट और पक्षी भी प्रभावित होंगे।
- मिट्टी और जल चक्र: मूल वनस्पति के खत्म होने से मिट्टी की उर्वरता और भूजल स्तर पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।
- कार्बन अवशोषण: जंगल धरती के फेफड़े हैं। यदि पौधे नष्ट हुए, तो हवा से कार्बन सोखने की धरती की क्षमता भी कम हो जाएगी, जो ग्लोबल वार्मिंग को और तेज करेगा।
इस संकट से कैसे बचा जा सकता है?
वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि सिर्फ पौधों को इंसानों द्वारा एक जगह से दूसरी जगह ले जाने से बात नहीं बनेगी। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे:
- उत्सर्जन में कटौती: ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तत्काल और भारी कमी लानी होगी।
- बीज बैंकों का निर्माण: दुर्लभ और विलुप्त हो रही प्रजातियों को बचाने के लिए सीड बैंक को मजबूत करना होगा।
- प्राकृतिक गलियारे: जंगलों को आपस में जोड़ने वाले सुरक्षित प्राकृतिक गलियारे बनाने होंगे ताकि इकोसिस्टम का संतुलन बना रहे।
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