दुनिया भर में हर साल 2 फरवरी को “विश्व आर्द्रभूमि दिवस” (World Wetlands Day) मनाया जाता है। यह दिन उस महत्वपूर्ण समझौते की याद दिलाता है जो 1971 में ईरान के रामसर शहर में आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए हुआ था। साल 2026 का यह अवसर भारत के लिए अत्यंत गौरवशाली है, क्योंकि देश ने अपनी प्राकृतिक विरासत को सहेजने की दिशा में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है।
2026 की थीम
इस साल संयुक्त राष्ट्र (United Nations) और रामसर सचिवालय द्वारा घोषित थीम “Wetlands and Traditional Knowledge: Celebrating Cultural Heritage” (आर्द्रभूमि और पारंपरिक ज्ञान: सांस्कृतिक विरासत का जश्न) रखी गई है। यह थीम इस बात पर जोर देती है कि स्थानीय समुदायों और स्वदेशी लोगों के पास आर्द्रभूमियों के प्रबंधन का सदियों पुराना ज्ञान है। भारत जैसे देश में, जहाँ सदियों से तालाबों और झीलों की पूजा की जाती रही है, यह विषय हमारे पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों को पुनर्जीवित करने का एक संदेश देता है।
भारत में रामसर साइट्स का नया आंकड़ा
भारत ने इस साल अपनी आर्द्रभूमियों के संरक्षण में लंबी छलांग लगाई है। World Wetlands Day 2026 की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने 2 नई साइट्स – पटना पक्षी अभयारण्य (उत्तर प्रदेश) और छारी-ढांड (गुजरात) – को रामसर सूची में शामिल किया है।
इन दो नई साइट्स के जुड़ते ही भारत में रामसर स्थलों की कुल संख्या 98 हो गई है। दक्षिण एशिया में भारत अब सबसे अधिक रामसर साइट्स वाला देश बन चुका है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि भारत ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज के दौर में अपने ‘नेचुरल स्पंज’ (आर्द्रभूमियों) को बचाने के लिए कितना गंभीर है।
आर्द्रभूमि: पृथ्वी की किडनी और संकट का समाधान
आर्द्रभूमियाॅं ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ पानी साल भर या साल के कुछ समय के लिए जमीन को ढक लेता है। इन्हें “पृथ्वी की किडनी” कहा जाता है क्योंकि ये पानी को छानकर शुद्ध करने का काम करते हैं।
- बाढ़ नियंत्रण: आर्द्रभूमियाँ स्पंज की तरह काम करती हैं, जो भारी बारिश के दौरान अतिरिक्त पानी को सोख लेती हैं और बाढ़ के खतरे को कम करती हैं।
- कार्बन सिंक: ये क्षेत्र जंगलों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से कार्बन को सोखते हैं, जो जलवायु परिवर्तन से लड़ने में महत्वपूर्ण है।
- जैव विविधता: दुनिया की लगभग 40% प्रजातियां आर्द्रभूमियों में रहती हैं।
भारत के प्रमुख वेटलैंड्स और उनकी वर्तमान स्थिति
वर्तमान में भारत में लगभग 1.3 मिलियन हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र रामसर साइट्स के रूप में संरक्षित है।
- उत्तर प्रदेश: पटना पक्षी अभयारण्य के जुड़ने के बाद उत्तर प्रदेश भारत में सबसे अधिक रामसर साइट्स वाले राज्यों में शीर्ष पर बना हुआ है।
- तमिलनाडु: यहाँ भी रामसर स्थलों का एक बड़ा नेटवर्क है जो प्रवासी पक्षियों के लिए स्वर्ग माना जाता है।
- ओडिशा की चिल्का झील: भारत की सबसे पहली रामसर साइट होने के नाते, यह संरक्षण का एक सफल मॉडल पेश करती है।
हालांकि, बढ़ते शहरीकरण और प्रदूषण के कारण कई वेटलैंड्स संकट में हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में वेटलैंड्स जंगलों की तुलना में तीन गुना तेजी से लुप्त हो रहे हैं। भारत के ‘अमृत धरोहर’ मिशन ने इन साइट्स के ईको-टूरिज्म और स्थानीय आजीविका को बढ़ावा देकर संरक्षण की एक नई राह दिखाई है।
आर्थिक और पर्यावरणीय योगदान
आर्द्रभूमियों का योगदान केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। भारत में लाखों लोग अपनी आजीविका के लिए इन पर निर्भर हैं। मछली पालन, कृषि और पर्यटन के माध्यम से ये क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करते हैं। ताज़ा सरकारी आंकड़ों के अनुसार, रामसर साइट्स के विकास से स्थानीय समुदायों की आय में 20% तक की वृद्धि देखी गई है, क्योंकि यहाँ पक्षी प्रेमियों और प्रकृति प्रेमियों का आना-जाना बढ़ा है।
2026 में छारी-ढांड जैसी साइट्स को अंतरराष्ट्रीय महत्व मिलना यह सुनिश्चित करता है कि गुजरात के कच्छ जैसे अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में जल संरक्षण के प्रयासों को वैश्विक पहचान मिले। वहीं एटा (UP) का पटना पक्षी अभयारण्य न केवल पक्षियों के लिए बल्कि भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) के लिए भी संजीवनी है।
संरक्षण की चुनौतियां और भविष्य की राह
98 रामसर साइट्स का होना भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन चुनौती इनके निरंतर रख-रखाव की है। प्लास्टिक प्रदूषण, कृषि रसायनों का बहाव और अवैध निर्माण आर्द्रभूमियों के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा है। डिजिटल इंडिया के दौर में, अब इन साइट्स की निगरानी के लिए सैटेलाइट मैपिंग और “वेटलैंड हेल्थ कार्ड” का उपयोग किया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य आने वाले सालों में इस संख्या को 100 के पार ले जाना है, ताकि भारत का हर इकोलॉजिकल क्षेत्र इस वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा बन सके।
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