यूपी के वेटलैंड्स में फिर गूंजे सारस के गीत: 12 सालों में 5 गुना बढ़ी राज्य पक्षी की आबादी, किसानों की मेहनत लाई रंग

पूर्वी उत्तर प्रदेश के खेतों और वेटलैंड्स (आर्द्रभूमियों) से पर्यावरण प्रेमियों के लिए एक बेहद सुकून देने वाली खबर आई है। उत्तर प्रदेश के पक्षी “सारस” जिनकी संख्या कभी तेजी से घट रही थी, वे अब फिर से चहकने लगे हैं। पिछले 12 सालों के अथक प्रयासों, वन विभाग की मुस्तैदी और स्थानीय किसानों की संवेदनशीलता के कारण, पूर्वी यूपी के 10 जिलों में सारस की आबादी लगभग 5 गुना बढ़ गई है। साल 2013 में जहां इनकी संख्या महज 681 थी, वहीं 2025 के आंकड़ों के अनुसार यह बढ़कर 2,878 हो गई है। यह सफलता साबित करती है कि अगर इंसान और प्रकृति के बीच तालमेल हो, तो विलुप्त होते जीवों को भी बचाया जा सकता है।

‘सारस मित्र’ और जमीनी स्तर पर संरक्षण

यह शानदार बदलाव रातों-रात नहीं आया है। साल 2013 में “वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया” (WTI) ने टाटा ट्रस्ट और यूपी वन विभाग के साथ मिलकर “सारस हैबिटेट सिक्योरमेंट प्रोजेक्ट” की शुरुआत की थी। इस प्रोजेक्ट की सबसे खास बात इसकी “सामुदायिक भागीदारी” रही। गांव-गांव में ‘सारस संरक्षण समितियां’ बनाई गईं और स्थानीय युवाओं को “सारस मित्र” के रूप में चुना गया। ये सारस मित्र हर साल दूरबीन लेकर इन पक्षियों की गिनती करते हैं और उनके घोंसलों की रखवाली करते हैं। 2013 से पहले कभी-कभार इन पक्षियों का शिकार भी हो जाया करता था, लेकिन आज पूरा गांव एक परिवार की तरह इनके अंडों की रक्षा करता है।

किसानों का त्याग: नुकसान सहकर भी बचा रहे हैं जीवन

सारस अक्सर पानी से भरे धान के खेतों में अपने बड़े-बड़े घोंसले बनाते हैं। घोंसला बनाने की इस प्रक्रिया में किसानों की लगभग एक क्विंटल फसल का नुकसान हो जाता है। लेकिन जागरूकता का असर ऐसा है कि आज किसान इस नुकसान का अफसोस नहीं करते। इसके बजाय, वे इसे अपने राज्य पक्षी के संरक्षण में अपना अहम योगदान मानते हैं।

  • सफलता के आंकड़े: 2013 से अब तक सारस के 1,800 से ज्यादा घोंसलों को सुरक्षित किया जा चुका है। हर साल 200 से अधिक अंडों को सफलतापूर्वक बचाया जा रहा है।
  • मिलता है सम्मान: इन पर्यावरण रक्षक किसानों को हर साल “विश्व आर्द्रभूमि दिवस” (2 फरवरी) के मौके पर सम्मानित किया जाता है। हाल ही में निचलौल रेंज में 35 किसानों और सारस मित्रों को 52 घोंसलों (104 अंडों) की सफल सुरक्षा के लिए सम्मानित किया गया।

ग्रामीणों का जुड़ाव इस कदर है कि बैदौली गांव के एक पूर्व सैनिक ने जलकुंभी में फंसे सारस के दो बच्चों को बचाने के लिए पानी में छलांग लगा दी और उन्हें बाहर निकालकर सीपीआर (CPR) देकर उनकी जान बचाई।

चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं

इतनी बड़ी सफलता के बावजूद, सारस का जीवन पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, आज भी कई गंभीर खतरे मंडरा रहे हैं:

  • हाई-टेंशन तार: खेतों के ऊपर से गुजरने वाले बिजली के तारों में उलझकर और करंट लगने से सारस अक्सर अपनी जान गंवा देते हैं।
  • सिकुड़ते वेटलैंड्स: मछली पालन के लिए ठेकेदार अक्सर पानी रोकने के लिए छोटे बांध बना देते हैं, जिससे वेटलैंड्स का प्राकृतिक हाइड्रोलॉजी सिस्टम नष्ट हो रहा है और पानी की कमी हो रही है।
  • जहरीली खेती: खेतों में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बढ़ते अंधाधुंध इस्तेमाल से न सिर्फ खेत बल्कि आसपास के पानी के स्रोत भी जहरीले हो रहे हैं।
  • खेती का बदलता पैटर्न: धान और गेहूं की जगह गन्ने जैसी फसलों की खेती बढ़ने से सारस के लिए अपना घोंसला बनाने की प्राकृतिक जगहें कम हो रही हैं।

आगे का रास्ता क्या है?

विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि सारस और हमारी जैव-विविधता को लंबी उम्र देने के लिए वेटलैंड्स को कानूनी रूप से सुरक्षित करना होगा। वेटलैंड्स को सिर्फ “पानी के गड्ढे” के रूप में नहीं, बल्कि जैव-विविधता संरक्षण और ग्रामीण आजीविका की धुरी के रूप में देखना होगा। शासन स्तर पर “जिला आर्द्रभूमि समितियों” का गठन तो हुआ है, लेकिन अब जमीनी स्तर पर इनके ठोस और कड़े एक्शन की जरूरत है। सारस का यह लौटता हुआ गीत हमें बताता है कि प्रकृति खुद को सुधार सकती है, बशर्ते हम उसे थोड़ा मौका दें।


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